टूटता तिलिस्म

‘Tootata Tilism’, a poem by Pranjal Rai

संवादों के दौरान अक्सर अधूरे रह जाते हैं कुछ प्रश्न,
कि प्रश्नों का अधूरा रह जाना
कितना ज़रूरी है एक नया संवाद गढ़ने के लिए !

किन्तु देखो कि किस तरह प्रश्नों का प्रश्नवाचक मिटा दिया गया है चुपके से,
मानो प्रश्न नहीं, सविनय अनुरोध हों;
सोचता हूँ कि इतिहास के प्रश्नों के सामने
किस भूमिका में खड़े होंगे ये लोग,
जिनके मुँह से ग़ायब है जीभ !

‘अ’-सहमतियों के उपसर्गों को
पन्नों से पोंछ देने को बेचैन है सत्ता,
कि सड़कों पर कुचली पड़ी है वह आवाज़
जिसकी लय भीड़ से मिल नहीं पायी ।

‘जय किसान’ बोलो कि राजधानियों में
लहू से सींच दी जाती है,
किसानों की देह की फसल ।
बोलो ‘जय जवान’
कि सीमा पर मरते सैनिकों की देह से ग़ायब हैं चेहरे ।

पाँच सालों से सोयी सत्ता की ममता अचानक
जागती है चुनावों के सिरहाने ,
आह कितना क्रूर स्वांग !
कि रोटी का प्रश्न धीरे-धीरे तब्दील होने लगता है
श्मशान की राख में ।

जाकर सत्ता की ‘स्वर्ण-लंका’ को सूचित कर दो
कि वे जो मजबूर हैं चिंगारियों की गंध में सोने को,
अँधेरा सोखती उनकी तीसरी आँख नींद से उठने को है ।

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