“दोनों अपने-अपने एग्जाम में व्यस्त थे, मिलना तो दूर अक्सर msgs का रिप्लाय करना भी मुश्किल हो जाता था। पर भरोसा था उन्हें एक दूसरे पर। बहुत ही ज्यादा। ये भरोसा ही होता है मियाँ जो लंबे लंबे गैप के बाद जब आपको मिलाता हैं न तो आँखों में वो चमक, होंठो पे वो मुस्कान और बकर बकर करते खामोश लफ़्ज़ भी खिल उठते हैं। हाँ पर प्रेम कित्ता भी क्यों न हो पर प्रायोरिटी एक दूसरे का कैरियर भी होती है! शायद इसी को maturity कहते है ।

लड़के को मालूम था के वो परीक्षा के बाद 3 महीने के लिए घर जाने वाली है। लड़की का नेट जेआरएफ का एग्जाम खत्म हुआ था और लड़के का सी.जी.एल. का मेन्स। पेपर खत्म होने के बाद दीदी क़े यहां से पहले से ही बुलउवा था। और दीदी के यहां से 3 महीने के लिए घर। रेसर्वशन भी हो चुका था। लड़की की ट्रेन रात 11 बजे की थी, पहुचने का समय सुबह 9:30 का था। आर ए सी बर्थ की उप्पर वाली सीट मिली थी।

“जा रही हो! 3 महीने अजीब लगेगा। समझ नही आ रहा कटेगा कैसे?”

“हाँ वहां पे फोन पे भी ज्यादा बात नहीं कर पाऊँगी। पर तुम अच्छे से रहना। तब तक हम दोनों का रिजल्ट भी आ जायेगा।”

“रिजल्ट की फिकर कभी नहीं रही। सामान सब बांध के रखना। खाने की चीजे भी धर लेना। और हाँ हिरोइनि बन के मत जाना रात में मौसम सर्द रहता है।”

“हाँ हाँ समझ गए। जैसा आप कहें सरकार।” (हस्ते हुए)

“हम भी चलें?”

“सच में? चलो! हमें भी अच्छा लगेगा!”

“hahaha हम नहीं जायेंगे। बड़ा काम है यार।”

“कोई बात नहीं। तुम्ही ने तो कहा!”

जाने का दिन आ गया! ट्रेन प्लेटफॉर्म पे खड़ी थी। जाने का सिग्नल भी मिल गया।

“ट्रेन मिली, सीट मिली? पानी लिया है के नहीं? टिकट? id?” जैसे सवाल msg पे लड़का पूछे जा रहा था। ट्रेन चलने लगी और लड़की के भाई ने लड़की को विदा कर दिया। लड़की आराम करते हुए इयरफोन में गाना सुनने लगी। इतने में नीचे से आवाज़ आई “टिकट?”

लड़की ने बैग से टिकट निकल के नीचे देखा.. लड़का मुस्कियाते हुए खड़ा है।

(उफ़्फ़्फ़्फ़ ऐसी बोलती हुई मुस्कान.. हस्ती हुई चमकती आँखे, न जाने उस एक सेकेण्ड में कितनी सौगातें मिल चुकी थी। सफ़र के हसीं होने की शुरुवात हो चुकी थी।)

“तुम! तुम कैसे आ गये!”

“अरे खुश हो कि अगले स्टेशन पे उत्तर जाएं?”

“भक्क! टिकट लिया है के पेनाल्टी भी हम ही से भरवाओगे? hahaha!!”

“हाँ लिए हैं वेटिंग टिकट हैं!”

“लाओ बैग दो। आओ!”

(लड़का सीट पे बैठता है, बातों का सिलसिला शुरू हो चुका था। रात गहरा रही थी और नींद आँखों में चढ़ रही थी। )

“2 बज गया! हमें नींद आ रही है अब! सोना है.. तुम सीधे होक लेटो अब”

“अब एक्क्य सीट है बैग की तकिया तो बन नहीं पायेगी इसमें..!

“हाँ तुम्हारा हाथ है न मेरी तकिया”

(लड़की लड़के के कन्धे पे सर रख के लेट गयी)”

“बड़ी भारी हो बे तुम तो!”

“hahaha टिकट मेरा कन्फर्म है तुम्हारा नहीं! तो नाटक न करो। चुप चाप रहो और रात भर जागते रहना। कोई सामान इधर से उधर नहीं होना चाहिए। ये लो मेरा चश्मा! इसे भी कुछ नहीं होना चाहिए।

“अच्छा जी। जो हुकुम! और कुछ?” (लड़के ने इतना कहते हुए उसके कान में कहा..)

“हम हैं न डरो मत! ”

(लड़की की आँख लग चुकी थी। लड़का रात भर वो बच्चों वाली बेबाक सी सोने वाली लड़की को देखता रहा.. कंधे पे सर, सीने पर हाथ और बीच बीच में बड़बड़ाना..)

“सोना मत सोना मत!!”

(लड़की को सुकून था के वो उसके कंधे पे लेटी है और लड़के को सुकून के वो सुबह तक साथ ही रहेंगे। ये जो प्रेम में साथ होना होता है न इसमें बड़ी सादगी होती है सिंप्लिसिटी होती है और होता है सुकून के चाहे पास कुछ हो न हो पर “वो” तो हैं। लड़का रात भर बस उसी को देखता रहा मुस्कुराता रहा और बस यही मनाता रहा के “काश! ट्रेन लेट हो जाये!”

लड़के ने लड़की का इयरफोन कान में लगाया.. धीमें धीमें गाना बज रहा था..

“लग जा गले के फिर ये हसीं रात हो न हो!! शायद इस जनम में मुलाक़ात हो न हो!!”

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