मज़हब की शुरुआत और काम का बँटवारा

अनुवाद: प्रेमचंद पिछले ख़त में मैंने तुम्हें बतलाया था कि पुराने ज़माने में आदमी हर एक चीज़ से डरता था और ख़याल करता था कि...

सात कहानियाँ – लीडिया डेविस

लघु-कहानियों के लिए चर्चित अमेरिकी कथाकार लीडिया डेविस ने निबन्ध, अनुवाद और उपन्यास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किया है। फ़्रांसीसी व अन्य...

अगर

Poem: 'If' - Rudyard Kipling अनुवाद: प्रीता अरविन्द अगर आपके आसपास लोग ग़लतियाँ कर उसका ठीकरा आपके सर फोड़ें और आप शांत रहें, अगर सभी लोग आप पर संदेह करें...

वहम

मूल कविता: 'वहम' - विजय राही अनुवाद: असना बद्र जब भी सोचा मौत के बारे में मैंने चंद चेहरे रूबरू से आ गए वो जो करते हैं मोहब्बत बे...

जातियों का बनना

'Jaatiyon Ka Banana', a letter from Jawaharlal Nehru to his daughter Indira Gandhi अनुवाद: प्रेमचंद मैंने पिछले ख़तों में तुम्हें बतलाया है कि शुरू में जब...

अन्दर की सर्दी

Poem: 'The Cold Within' by James Patrick Kinney अनुवाद: प्रीता अरविन्द पूस की घनी अँधेरी सर्द रात में छः राहगीर जो एक-दूसरे से परिचित न थे, एक मुसाफ़िरख़ाने में बैठे...

छोड़ना होगा

मूल कविता: सुजाता महाजन अनुवाद: सुनीता डागा छोड़ना होगा उम्र के चालीसवें पड़ाव पर आँख मूँदकर जीने की परिपाटी को, दिन रेत की तरह हाथ से फिसलता जाता हो तब नहीं...

सृष्टि कथा

दार्शनिक, प्रशिक्षित भौतिकविज्ञानी और धर्मशास्त्री विलियम बी. ड्रीस 2015 से तिलबुर्ग स्कूल ऑफ ह्यूमनिटिज़ में डीन और प्रोफ़ेसर के रूप में सेवाएँ दे रहे हैं।...

रामस्वरूप किसान की कविताएँ

Poems: Ramswaroop Kisan कविता संग्रह 'आ बैठ बात करां' से चयन व अनुवाद: राजेन्द्र देथा कितने भोले हैं वे मैं उनके सामने औरों की तरह हाथ बाँधकर नहीं जाता न ही दाँत निकाल पूँछ...

सभ्यता क्या है?

'Sabhyata Kya Hai', a letter from Jawaharlal Nehru to his daughter Indira Gandhi अनुवाद: प्रेमचंद मैं आज तुम्हें पुराने ज़माने की सभ्यता का कुछ हाल बताता...

दूरियाँ

Excerpt from a poem 'To Duration' by Peter Handke अनुवाद: उपमा 'ऋचा' न जाने कब से मैं दूरियों के बारे में लिखना चाहता था। कोई निबन्ध नहीं कोई नाटक नहीं कोई...

लियोपोल्ड स्टाफ की कविताएँ

Poems by Leopold Staff, a Polish poet अनुवाद: आदर्श भूषण क्या तुम? तुम मुझे बुलबुल, गुलाबों और चाँद की प्रशंसा करने से मना करते हो, ये शायद लगते हों...

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Kirti Chaudhary

सुख

रहता तो सब कुछ वही है ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले... बदलता तो कुछ भी नहीं है। लेकिन क्या होता है कभी-कभी फूलों में रंग उभर आते हैं मेज़पोश-कुशनों...
Women at beach

मन का घर, तुमसे विलग होकर

मन का घर उसके मन के घर में गूँजती रहती हैं टूटती इच्छाओं की मौन आवाज़ें उसमें हर बालिश्त दर्ज होती जाती है छूटते जा रहे सपनों से पलायन की एक लम्बी...
Bashar Nawaz

वक़्त के कटहरे में

सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है अपने जुर्म पे रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
Giriraj Kishore

नायक

'रिश्ता और अन्य कहानियाँ' से आँगन में वह बाँस की कुर्सी पर पाँव उठाए बैठा था। अगर कुर्ता-पाजामा न पहने होता तो सामने से आदिम...
Love, Couple

नीरव की कविताएँ

1 ढहते थे पेड़ रोती थी पृथ्वी हँसता था आदमी मरती थी नदी बिलखता था आकाश हँसता था आदमी टूटता था संगीत बुझता था प्रकाश हँसता था आदमी टूट रहा है आदमी बुझ रहा है...
Dilawar Figar

दावतों में शाइरी

दावतों में शाइरी अब हो गई है रस्म-ए-आम यूँ भी शाइर से लिया जाता है अक्सर इंतिक़ाम पहले खाना उसको खिलवाते हैं भूखे की तरह फिर उसे करते...
Bharat Bhushan

मन, कितना अभिनय शेष रहा?

मन, कितना अभिनय शेष रहा? सारा जीवन जी लिया, ठीक जैसा तेरा आदेश रहा! बेटा, पति, पिता, पितामह सब इस मिट्टी के उपनाम रहे, जितने सूरज उगते देखो उससे ज़्यादा संग्राम...
Mohammad Alvi

मैं और तू

ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि मैं तुझसे नज़रें मिलाऊँ तिरी शान में कुछ कहूँ तुझे अपनी नज़रों से नीचे गिराऊँ ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि...
Vishnu Khare

अकेला आदमी

अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लोग...
Ambar Bahraichi

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई एक शकरा पास ही...
Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Bulbbul - a comment

सीता और काली की बाइनरी से अछूती नहीं है ‘बुलबुल’

मनोरंजन के 'तीसरे' परदे के रूप में उभरे नेटफ़्लिक्स पर आयी फ़िल्म 'बुलबुल' इन दिनों ख़ूब चर्चा में है। चर्चा का मुख्य विषय है...
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इतिहास की कालहीन कसौटी

बन्‍द अगर होगा मन आग बन जाएगा, रोका हुआ हर शब्‍द चिराग़ बन जाएगा। सत्ता के मन में जब-जब पाप भर जाएगा झूठ और सच का सब अन्‍तर मिट जाएगा न्‍याय...
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बेटिकट

एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है और बेतहाशा चलती चली जाती है समय की किसी अज्ञात दिशा में मैं सवार...
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मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
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जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
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हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...
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दुनिया की नहीं तो यूरोप की छत : अपने पर्वतीय प्रदेश के कारण स्विटजरलैण्ड को प्रायः यह नाम दिया जाता था—किन्तु हिमालय को घर...
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Short Story: 'Araby' Writer: James Joyce अनुवाद: उपमा ऋचा लेखक परिचय: आयरलैण्ड के रचनाकार जेम्स जॉयस (1882-1941) ने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, उपन्यास भी लिखे और साहित्य...
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