तू ज़िन्दा है, तो ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

सुबह औ’ शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन
ये दिन भी जाएँगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

हमारे कारवाँ का मंज़िलों को इन्तज़ार है
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नयी डगर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

हज़ार भेष धर के आयी मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हारकर
नयी सुबह के संग सदा तुझे मिली नयी उमर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले
टिके, न टिक सकेंगे भूख-रोग के स्वराज ये
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इंक़लाब ये
गिरेंगे ज़ुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

शैलेन्द्र की कविता 'हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर में'

Book about Shailendra: