तुम्हारी आँखों में
सुन्दर लगते हैं सपने,

तुम्हारे होंठों पर
जीवित हो उठते हैं रंग,

जिस दिन तुम सर नहाती हो,
उस दुपहरी तुम्हारी पीठ से
निकलता है इंद्रधनुष,
तुम्हारे मुख से
बेहद ही
कोमल और मादक हो
निकलता है मेरा नाम

तुम्हारे चेहरे से गले तक
पंक्तिबद्ध हैं सप्तऋषि,
और तुम्हारे दाएँ वक्ष पर
मावस में भी
चमकता है अरुंधती,

तुम्हारी कलाई में
सुनहरा लगता है समय,
तुम्हारी उँगलियों के मध्य
सम्मोहक हो जाती है कलम,

तुम्हारी नाभी में
दिखती है
कामना के अंकुरण की
अनन्त सम्भावना,
तुम्हारे थिरकते पैरों में
खिलते हैं घुँघरू और आल्ता,

तुम्हारी देह में रहता है
एक चंचल-चपल हिरन,
तुम्हारे रहने से
मेरे बिखरे-गंदले कमरे में भी
दाख़िल होती है
सूरज की पहली किरन,

माना, माना यह सारी उपमाएँ,
सारी की सारी क्रियाएँ
हैं बहुत-बहुत पुरानी,
इन्हें इस्तेमाल में ला चुके हैं
कालिदास और भर्तृहरि,

पर, इस थकन भरी सुबह,
जब तुम हो दूर, बहुत दूर
मुझे कहना था बस इतना,
कि तुम अपनी लगती हो,
कि तुम अच्छी लगती हो।

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कुशाग्र अद्वैत
कुशाग्र अद्वैत बनारस में रहते हैं, इक्कीस बरस के हैं, कविताएँ लिखते हैं। इतिहास, मिथक और सिनेेमा में विशेष रुचि रखते हैं।अभी बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स कर रहे हैं।

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