हीरे, मोती, लाल जवाहर, रोले भर-भर थाली
अपना कीसा, अपना दामन, अपनी झोली ख़ाली
अपना कासा पारा-पारा, अपना गरेबाँ चाक
चाक गरेबाँ वाले लोगो तुम कैसे गुन वाले हो

काँटों से तलवे ज़ख़्मी हैं, रूह थकन से चूर
कूचे-कूचे ख़ुशबू बिखरी अपने घर से दूर
अपना आँगन सूना-सूना, अपना दिल वीरान
फूलों-कलियों के रखवालो, तुम कैसे गुन वाले हो

तूफ़ानों से टक्कर ले ली जब थामे पतवार
प्यार के नाते जिस कश्ती के लाखों खेवन-हार
साहिल-साहिल शहर बसाए, सागर-सागर घूम
माँझी अपनी नगरी भूले तुम कैसे गुन वाले हो

आँखों किरनें, माथे सूरज और कुटिया अँधियारी
कैसे लिख लुट राजा हो तुम समझें लोग भिखारी
शीशा सच्चा उजला जब तक ऊँचा उसका भाव
अपना मोल न जाना तुमने कैसे गुन वाले हो

जिन खेतों का रंग निखारे जलती-तपती धूप
सावन की फुवारें भी चाहें इन खेतों का रूप
तुम को क्या घाटा दिल वालो
तुम जो सच्चे हो गुन वाले हो!

अदा जाफ़री की नज़्म 'साँझ भई परदेस'

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