‘Tum Mere Liye Kya Ho’, a poem by Vikram Mishra

तुम क्या हो मेरे लिए

मैं वह अनमना-सा बच्चा हूँ
जिसे अपना सबसे प्रिय खिलौना
अपने आँखों के सम्मुख चाहिए
भले ही वो उससे ना खेले
पर दृष्टि से ओझल होने की कल्पना मात्र से ही
वह बेकल हो उठता है

तुम रेगिस्तान में दौड़ते
मुझ मृग के लिए मृग-मरीचिका हो
जो मात्र अपनी प्यास बुझने की सम्भावना लिए
तुम तक दौड़ा चला आता है

मैं वर्षों से अनावृष्टि झेलता
दरार पड़ा खेत हूँ
जिसे प्रतीक्षा है अतिवृष्टि की
चाहे इससे मेरी पोषकता ही
क्षरित क्यूँ न हो जाये
तुम अतिवृष्टि सा बरस पड़ो
ताकि मेरा कोना-कोना बाढ़ से आह्लादित होता रहे
महीनों नहीं, वर्षों तक

तुम मेरे लिए परमेश्वर का
भेजा गया वो संदेश हो
जिसमें मुझे नश्वरता त्याग तुममें विलीन होने को
आदेशित किया गया है

तुम अब तक का देखा गया
सबसे सुखद, समधुर
बारम्बार देखने की चाह वाला स्वप्न हो
जिसे देखने की अदम्य चाह लिए मैं चिर निद्रा में सो जाऊँ
ताकि जब तुम्हें देखना शुरू करूँ तो
देखता रहूँ
देखता रहूँ
बस… देखता रहूँ।

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