मैं आती भी भला कैसे, जब तुमने कभी पुकारा ही नहीं।
साथ निभाती भी मैं किसका, जब तुमसे कोई सहारा नहीं।
तुम अपनी मशरूफियों में मशरूफ रहे, मैं हर पल तुम्हारी यादों में मग़शूल रही।
तुम उलझे ही रहे सदा अपनी उलझनों में, मैं हमेशा तुम्हारे साथ से महरूम रही।
समझती रही कि होंगी तुम्हारी भी मजबूरियां बहुत, सही मैंने भी रुसवाईयां बहुत।
तुम अपने तुम में ही रह गए मैं अपने आप में ही सिमटती रह गई।
रास्ते उलझते रह गए और दूरियां बढ़ती चली गई ।
कभी कुछ हफ्तों की चुप्पी, कभी महीनों का सूनापन।
और फिर उन दूरियों का लम्बा सा कारवां बनता चला गया।
फिर अचानक से कभी तुम सामने आ जाते और ऐसा लगता कि तुम कहीं गए ही नहीं थे,
यहीं थे मेरे दिल में बहुत करीब।
फिर मुझे एहसास हुआ कि कुछ पाने के लिए खुद को खोना जरूरी तो नहीं।
और कभी कभी कुछ खो कर, खुद को पा लेना अच्छा होता है।
और तब मुझे एहसास हुआ कि तुम मेरे नहीं थे।
कहीं नहीं थे, कभी नहीं थे।

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