‘Tum Purush Hue, Main Agni’, a poem by Santwana Shrikant

मैं तुम्हारे
पूर्वजन्म का प्राप्य हूँ

पहली बार तुमने
आखेट के बाद
भोजन की चाह में
प्रज्वलित किया था मुझे,
तब से निरन्तर उष्मा देती हूँ
तुम्हारे जीवन को,
हालाँकि मैं भूख से जनी थी

तुम्हारी नवांकुर जिजीविषा ने
भविष्य की आकाँक्षा में
मेरी छाती को
माँ होने का सुख दिया

तुमने धारण किया
अपने रक्त में,
शिशु के ममत्व में
सम्पूर्ण हो गई मैं

किशोरावस्था में तुमने
प्रेम से परिपक्व
करना चाहा स्वयं को,
मेरे वक्षस्थल पर
महसूस किया तुमने
आकाशगंगा को,
और तुम ब्रह्माण्ड हुए।

जब तुम-
पिता के रूप में मिले
थामी तुम्हारी अँगुली,
संजोए मैंने
सुरक्षित भविष्य के स्वप्न।

कंधे पर बैठे शिशु के नेत्र
अभ्यस्त हुए तुम्हारे नेत्रों से
दुनिया देखने के।

जब बने प्रेमी तो
चूम लिया मेरी आत्मा को,
तुम्हारे स्पर्श का
वही एक क़तरा सुख,
जिसे बटोरकर मैं
अथक चलती रही
धरती से ब्रह्माण्ड तक।

वृद्धावस्था में अनन्त तक
साथ देने की प्रतिज्ञा की
और थामे रहे
इच्छाओं के हाथ
तुम पुरुष हुए
और मैं अग्नि…।

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