तुम साथ देते तो मैं—
सात समुन्द्रों को पीने की ललक
अगस्त्य मुनी से
छीन लाती,
ब्रह्माण्ड में धरती-सी घूम-घूम
अपने अक्ष पर
तुम्हारे गिर्द घूमने का
दम भरती,
शनि और मंगल के रथ पर
सूरज की परिक्रमा
कई-कई बार
कर आती

तुम साथ देते तो मैं
हिमालय के शिखर पर चमकी
पहली किरण की उष्मा
सहेज लाती,
समुद्र की तलहटी में
गहरे—बहुत गहरे तिरती
मछलियों की आँख की पुतली से
प्यार का मोती
चुरा लाती

लेह में गहरे
बहुत-बहुत गहरे बहती संगे-ख्वास की
हरी-हरी धार के हहराते
विद्रोही-गीत
हर लाती

तुम साथ देते तो मैं
महाभिनिष्क्रमण पर निकले गौतम बुद्ध को
कई-कई बार
लौटा लाती,
द्रौपदी से अम्बापाली का क्रम बदलकर
इतिहास से युधिष्ठिर को
हटा आती, मिटा आती,
लद्दाख के बौद्ध मंदिरों में रची
मुक्त प्रेम-कथाओं से
गुप-चुप
एक प्रेम-प्रसंग चुराकर
जी आती

तुम साथ देते तो मैं
पाम्पई की राख से
हिरोशिमा के विनाश से बची
जिजीविषा बीन
टुकड़ा-टुकड़ा मनुष्यता में कई-कई बार
बाँट आती,
पृथ्वी का आँगन प्रेम से लीप
सम्वेदना की अल्पना
पूर आती,
बंजर धरती पर प्यार के बिरवे कई-कई बार
रोप आती…
तुम साथ देते तो
तुम साथ देते तो
तुम साथ देते तो!

रमणिका गुप्ता की कविता 'उसे रोने की मनाही'

Book by Ramnika Gupta:

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रमणिका गुप्ता
(22 अप्रैल 1930 - 26 मार्च 2019)लेखिका, एक्टिविस्ट, राजनेता।

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