तुम स्त्री हो

‘Tum Stree Ho’, a poem by Mahima Shree

सावधान रहो, सतर्क रहो
किससे?
कब? कहाँ?
हमेशा रहो! हरदम रहो!
जागते हुए भी, सोते हुए भी।

क्या कहा!
ख़्वाब देखती हो?
उड़ना चाहती हो?
कतर डालो पंखो को अभी के अभी
ओफ़्फ़ तुम मुस्कुराती हो!
अरे तुम तो खिलखिलाती भी हो?
बंद करो
आँखों में काजल भर
हिरणी-सी कुलाचें मारना

यही तो दोष तुम्हारा है।
शोक गीत गाओ!
भूल गयी तुम स्त्री हो!

किसी भी उम्र की हो क्या फ़र्क़ पड़ता है!
आदम की भूख उम्र नहीं देखती
ना ही देखती है देश, धर्म औ’ जात
बस सूँघती है
मादा गंध!

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