तुम्हारे न होने पर दीवारें मुझे खाने को दौड़ती हैं,
और सकरी होने लगती हैं,

खिड़कियाँ स्वतः ही बंद होने लगती हैं,
दीवारों की पेंट उखड़ने लगती है,
छत और करीब आ जाती है,

कमरे की रोशनी अंधेरे में तब्दील होने लगती है,
हृदय का कंपन शोर लगने लगता हैं,
खुद को गर्भ के शिशु की तरह महसूस करता हूँ,

और मैं इस गर्भ से बाहर निकलना चाहता हूँ..

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अभय कुमार
अभी सीख ही रहा हूँ...

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