मैंने आवाज़ तो दी थी।
तुमने नहीं सुनी थी?

ख़्वाब भी मुफ़लिसी के आते हैं आजकल
आप थे तो ज़िंदगी कितनी हरी-भरी थी।

मियां! उसके जाने के बाद..
कुछ और परेशानियां भी थी।

तुम्हारे ज़िक्र के बगैर मेरी ग़ज़लों में
लगता है एक ख़ामोशी-सी थी।

एक-एक कर के ही चुकाऊंगा मैं
ख़ुशियाँ मैंने किश्तों में ली थी ।

शायर, पागल, मुसव्विर, खुशमिज़ाज
ये बातें, किसी और ज़माने की थी।

तुमसे निकला तो ख़बर मिली कि
अबकी बारिश बस यहीं हुई थी।

उसने समझा ही नहीं मुझको
हमारी गुफ़्तगू शायद नई-नई थी ।

मुक़म्मल नहीं हुई तो क्या हुआ
‘इल्म’ तेरी कहानी बहुत सही थी।

सब कुछ तो लिख दिया था मैंने
तुम्हारे नाम एक हर्फ़ की कमी थी।

उसकी आंखों से ज़्यादा कहानियां तो
किस्सागो के पास भी नहीं थी।

वक़्त भी ठहरा था कभी, बस!
याद नहीं वो मुझे कब मिली थी।

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