कविता: ‘बीस बुलेट’ (Twenty Bullets)
मूल कवि: अहमद मिक़दाद (Ahmed Miqdad)
अनुवाद: योगेश ध्यानी

मैं अपनी स्वतंत्रता के बारे में सोचते हुए
एक निर्दोष पक्षी की तरह
अपनी पवित्र भूमि पर विचर रहा था,
किन्तु वह भूमि शैतानों से घिरी हुई है
जो हर निर्दोष बच्चे को मार देते हैं
और हर उड़ते पक्षी को दाग़ देते हैं।

मेरे शिथिल शरीर से होकर
भयावह वर्षा की तरह
बीस बुलेट गुज़रीं,
उन्होंने मेरी भूमि पर उपद्रव किया
और मेरी पवित्र देह को छलनी कर दिया

मैंने महसूस की अपने रक्त की ऊष्णता
जैसे एक बाढ़ आ गयी हो मेरी पवित्र भूमि पर
मेरी लाल कालीन को घसीटने
और उसने मेरी देह को ढक दिया

मैंने देखे अपने बग़ीचे में
हर तरफ़ लाल गुलाब
देखीं रंगीन तितलियाँ
जो मेरे अपराधी शव पर उड़ रही थीं

मैंने श्वेत परियों को
मेरे कानों में कुछ फुसफुसाते देखा
देखा मेरा हाथ पकड़कर
मुझे स्वर्ग की ओर ले जाते हुए

बीस बुलेट ने मेरी आत्मा को मार दिया
छलनी कर दी मेरी देह
उल्लंघन किया मेरी पवित्रता का

काफ़ी हैं बीस बुलेट
चर्च की घण्टियाँ बजाने के लिए
मीनारों द्वारा मानवता का अंत घोषित कर देने के लिए
काफ़ी हैं ये बीस बुलेट।

(संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने पिछले साल कहा था कि इज़रायल के ख़िलाफ़ फिलिस्तीनियों के हमलों के लिए इज़रायल की प्रतिक्रियाएँ ‘सम्भावित अतिरिक्त न्यायिक निष्पादन सहित ग़ैरक़ानूनी हत्याओं का ज़ोरदार सुझाव देती हैं’।

पिछ्ला साल वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी बच्चों के लिए एक दशक में सबसे घातक था, जिसमें इज़रायली सेना और गार्ड ने 32 बच्चों की हत्या कर दी थी। जबकि मारे गए लोगों में से 24 पर हमला करने का आरोप लगाया गया था, डीसीआईपी सबूत और कई मामलों में इज़रायल की आंतरिक जाँच ने निर्धारित किया कि बच्चे को मारे जाने के समय प्रत्यक्ष नश्वर ख़तरा नहीं था।)

मेहतम शिफ़ेरा की कविता 'धूल एवं अस्थियाँ'

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