उलटे पैर

‘Ulte Pair’, a poem by Dwarika Uniyal

भटकती आँखों के ज्वालामुखी
ट्रैफ़िक सिग्नल पे बत्तियाँ नहीं देखते
मानों
फिसलते आँसुओं के बुलबुले में पिघलता लावा क़ैद हो!
गरज़ती बिजलियों की तड़प दिखती पहले है
और सुनायी बहुत बाद में
वैसे
घास काटती दरातियों से गुलाब नहीं छाँटे जाते!
यूँ तो रात के जुगनूओं को insomnia है
अभी
खौलती चाय के पानी में दालचीनी थोड़ी गरम है!
कुछ दफ़न हैं कुछ आधी जली हुई हैं
हाँ
ज़िंदगी की लाशें, ज़िंदा रूहों में पनाह पाती हैं!
वो कोई तारा नहीं कि टूटा और तुम्हारी चाहतें पूरी करेगा
ये तो
उल्का पिंड है, ज़ख़्म देगा ज़मीन की देह पर!
रात की चाशनी इतनी क्यों घोल ली तुमने?
अब चींटियाँ चढ़ेंगी और शक्कर छान छान कर अपने बिल में जमा करेंगीं!
घरों में सोते हो बिस्तरों में अपने कुत्ते की तरह
वहाँ
वो गली का लैम्प पोस्ट है कि आवारा बना है!
अधर में टंगे उस शून्य को क्या पा सकोगे कभी?
सुना है
दिलों के ब्लैक होल से रोशनी ना आर होती है ना पार!
शायद
इस रात के सायों के पैर उलटे हैं!

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