उस सदी की बात

कवि- अज्ञात

यह उस सदी की बात है
जब कविता लिखना
पढ़ना, सुनना और सुनाना
संगीन अपराध था

राज्य के निरंकुश राजा ने
ख़ुद को निर्वस्त्र कर पहन ली
फ़रेब की पारदर्शी पोशाक
राजसी मुनादी होते ही
राज के सारे कवि
देखते ही देखते
बन गये भांड
गाने लगे ऊँची आवाज़ में
प्रशस्ति का आल्हा

जो बचे, जिन्होंने इंकार किया
पालतू बनने से
उनका सिर या तो क़लम कर दिया गया
या फिर उन्हें
भूखे कुत्तों के हवाले किया गया
फिर भी
तमाम राजसी चेष्टाओं के बावजूद
कुछ कवि
न भांड हुए
न मारे गये
तमाम खुफ़िया तंत्र
और फ़ौजी बूटों को
धता बताते
रात के सन्नाटों में
दूर कहीं किसी बियाबान में
ढिबरी जलाकर चुपचाप
कविताओं के बीज बोते रहे

ऐसे ही कुछेक  लोग
अंततः राजा के सर्वग्रासी सपनों
की राह का रोड़ा बने
और बने इस सदी की
आख़िरी उम्मीद
यह वाक़ई उसी सदी की बात थी

यह उस सदी की बात है
जब अँधेरा बहुत घना था
मान लिया गया मुग़ालतों को मुक़द्दर
कविनुमा आदमी के उग आयी थीं
झब्बेदार दुम और
अदद लपलपाती जीभ…

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