किताब अंश: ‘उसने गाँधी को क्यों मारा’ – अशोक कुमार पांडेय

यह किताब जहाँ एक तरफ़ गांधी पर अफ़्रीका में हुए पहले हमले से लेकर गोडसे द्वारा उनकी हत्या के बीच गांधी के पूरे राजनैतिक जीवन में उन पक्षों पर विस्तार से बात करती है जिनकी वजह से दक्षिणपंथी ताक़तें उनके ख़िलाफ़ हुईं तो दूसरी तरफ़ उन पर हुए हर हमले और अन्त में हुई हत्या की साज़िशों का पर्दाफ़ाश करती है। दस्तावेज़ों की व्यापक पड़ताल से यह उन व्यक्तियों और समूहों के साथ-साथ उन कारणों को स्पष्ट रूप से सामने लाती है जिनकी वजह से गांधी की हत्या हुई। यह किताब दक्षिणपंथ के गांधी के ख़िलाफ़ होने के कारणों, कांग्रेस के भीतर के अन्तर्विरोधों और विभाजन की प्रक्रिया सामने लाती है। इसके अलावा एक पूरा खण्ड गोडसे द्वारा अदालत में गांधी पर लगाए गए आरोपों के बिन्दुवार जवाब का है। इस किताब को पढ़ते हुए हिन्दी का पाठक एक ही किताब में गांधी के दर्शन, उनकी वैचारिक यात्रा और उनकी हत्या की साज़िश के राजनीतिक कारणों से परिचित हो सकेगा। किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

इसलिए ज़रूरी है यह याद रखना कि 30 जनवरी, 1948 को गांधी पर हुआ यह हमला पहला नहीं था। भारत में और अफ़्रीका में भी उन पर कई हमले हुए थे। हर बार हमलावर धार्मिक/नस्ली कट्टरपंथ के हथियार के साथ था तो गांधी ने हर बार उसका मुक़ाबला साहस और सत्य के साथ किया। यह सिर्फ़ इत्तफ़ाक़ नहीं है कि भारत आने के बाद उन पर हुए सभी हमलों में हिन्दुत्व की बात करने वाले कट्टरपंथी शामिल थे। गोडसे और आप्टे ने इसके पहले भी उन्हें मारने की कोशिश की थी। आख़िर गांधी उनके लिए इतना बड़ा ख़तरा क्यों थे? गांधी से असहमति तो कम्यूनिस्टों की भी थी, मुस्लिम कट्टरपंथियों की भी। क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसा की तो वह लगातार आलोचना कर रहे थे। लेकिन किसी और ने उन पर कोई शारीरिक हमला नहीं किया। आज़ादी की पूरी लड़ाई में वैचारिक विरोध रहे लेकिन इस क़द के एक भी नेता की हत्या का मामला नहीं आया सामने। फिर हिन्दुत्व के विचारक ही उन्हें मारना क्यों चाहते थे? शत्रुता की इस हद का क्या कारण था जिसमें बन्दूक़ की नली अंग्रेज़ों की तरफ़ नहीं, गांधी की तरफ़ थी?

कारण बहुत स्पष्ट हैं—पहला तो यही कि गांधी हिन्दू थे और हिन्दू धर्म की उस उदात्त परम्परा के संवाहक जो वसुधैव कुटुम्बकम् में भरोसा रखती थी। पढ़िए इस श्लोक को—अयं निजः परो वेति, गणना लघुचेतसाम्/ उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। अपने-पराये का भेद करने वालों को छोटे दिल का समझने वाला यह विश्वास उस उदारता की पैरवी करता है जो पूरी धरती को अपने परिवार की तरह मानती है। हर धर्म के भीतर उदात्त और रूढ़िवादी परम्पराएँ हमेशा से रही हैं और उनके बीच की टकराहट भी।

उदात्तता धर्म का विस्तार करती है, अन्य धर्मों के साथ इसके सहज दोस्ताना सम्बन्ध बनाती है, दुनिया भर से ज्ञान हासिल करती है और रूढ़िवाद लगातार दुश्मन की तलाश में रहता है। वह पहले दूसरे धर्म को दुश्मन बनाता है। फिर अपने धर्म के भीतर असहमत लोगों को, अन्त में हर उस व्यक्ति को जिससे उसे ख़तरा लगता है और फिर ख़ुद नष्ट हो जाता है।

हिन्दुत्व की ताक़तें मुसलमान और ईसाइयों के बाद कम्यूनिस्टों को दुश्मन बताती हैं, दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार करती हैं। महिलाओं को घर में क़ैद करने की कोशिश करती हैं और फिर आपस में लड़ने लगती हैं। इस्लाम अन्त में अपने ही फ़िरकों, शियों, अहमदियों और सूफ़ियों से दुश्मनी निकालने लगता है। हिंसा जब जीवन मूल्य बन जाए तो उसे लगातार रक्त चाहिए। गांधी ने इसके बरअक्स अहिंसा को जीवन मूल्य बनाया था। वह महाभारत से हिंसक उदाहरण ग्रहण नहीं करते बल्कि उस महाकाव्य की मूल शिक्षा ग्रहण करते हैं—हिंसा की निरर्थकता।

'उसने गांधी को क्यों मारा' पर नरेंद्र सहरावत की एक टिप्पणी

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पोषम पा
सहज हिन्दी, नहीं महज़ हिन्दी...

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