आज जब अख़बार देते हैं ख़बरें
हमारी अस्मिता लुट जाने की
बर्बरता और घिनौनी चश्मदीद
घटनाओं की
ख़ून खौल क्यूँ नहीं उठता हमारा?
सफ़ेदपोशी में ढँकते-ढाँपते
हम मुर्दा ही हो चले हैं।
ख़ाक होना है एक दिन सबको
फिर आज ही लड़कर
ख़ाक क्यों नहीं होते?

जानते हो न?
एक ज़माने में अख़बारों में
हमारी परछाइयाँ भी वर्जित थीं
अभिव्यक्ति पर पाबन्दी थी
अशिक्षा-अंधकार नियति थी
तब मुर्दों से अछूतों में
स्वाभिमान की चिंगारी
फूटती थी
चिथड़ों से लिपटे कंकालों ने
तुम्हारे-हमारे लिए दो गज़ ज़मीन
स्वाभिमान और आज़ादी
की जंग जीती थी
चिथड़ों में लिपटे इंसान आज भी हैं
उनकी भूख और बूढ़ी आँखें देख
मुँह फेरकर चल सकते हो,
परन्तु यह हमारा अतीत है
हमारी सफ़ेदपोशी
उनके संघर्षों का वजूद है।

रजनी तिलक की कविता 'औरत-औरत में अन्तर है'

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