विकास की क़ीमत

‘Vikas Ki Qeemat’, a poem by Rachana

वो कह रहे हैं कि हम विकसित हो रहे हैं
बढ़ रहे हैं आगे
चढ़ रहे हैं सीढ़ियाँ सभ्यता की
दिन पर दिन
मगर ये सीढ़ियाँ चीर रही हैं कलेजा
हमारी माँ का…
हाँ! माँ ही तो है
पाला हमें, आश्रय दिया
दिया भोजन, आजीविका
और प्रेम अपरिमित…
वो गिन रहे हैं हमें
संख्या में, गाँवों में, बस्ती में, पेड़ों में
अंकों में पहचान कर रहे हैं हमारी
नहीं गिनते वो ज़िन्दगियाँ
जो जुड़ी हैं इनसे
जीती हैं इनके दम पर
नहीं गिनते वो साँसें जो हमने पायीं
नहीं गिनते हर वो निवाला, वो छाँव
जो मिला बिना किसी भेद के सबको
हमेशा…
दे पाओगे मुआवज़ा
हर उस फूल को जो गिरेगा और कुचला जाएगा
हर उस चिड़िया को जिसका घोंसला उजड़ेगा
दे पाओगे घर उन सबको जो बेघर हो जायेंगे
नहीं…
तुम नहीं दे पाओगे
फिर किसने दिया तुम्हें अधिकार
वो नष्ट करने का
जो तुम बना नहीं सकते
छोड़ दो हमें अकेला!
हम ख़ुश हैं… अपनी दुनिया में
माँ के छलनी सीने से गुज़रती
विकास की पटरियाँ हमें नहीं चाहिए
हम ख़ुश हैं… प्रकृति के सानिध्य में
पैरों में आँधियों के पंख
तुम्हें मुबारक हों…!

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