विश्व भर की हलचलें गहरे तिमिर में खो गयीं!
पड़ गया हरियालियों का रंग कुछ-कुछ साँवला,
भौंर की मधु बाँसुरी का स्वर कहीं लय हो गया,
बालपन की नींद में अनजान कलियाँ सो गयीं!

इस समय सतलुज नदी का तामसी तट मौन है!
झोंपड़ी के पास माँझी सो रहा है बेख़बर,
और नौकाएँ बँधी हैं शान्त जल की धार पर,
पार परले जा सके, तैराक ऐसा कौन है!

हो रही है नील नभ में रूप तारों की सभा!
कल्पनाएँ दूधिया-पथ पर विचरती हैं जहाँ,
मोतियों के खेत में ज्यों खेलती हों तितलियाँ,
रात भीगी जा रही है स्वप्न का जादू जगा!

विश्व सारा सो रहा है नींद के प्रासाद में!
किन्तु मन अब भी सजग-सा है किसी की याद में!

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शम्भुनाथ शेष
(2 जून 1915 - 23 मई 1958)कविता संग्रह 'सुवेला' के कवि

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