हम उस दौर में है
जब सिकुड़ने लगती है याददाश्त
और
असंख्य शाप पीछा करते हैं

कितना आसाँ होता है
पलट कर विस्मृति का एलबम खोल
बिना जोखिम के
कहीं पर भी कंपकपाती उँगली धर
धीमे शब्दों में बोलना

हर नई भूलभुलैया में भी
जीवन के बीहड़ में
बहुत कुछ छूट जाने का पछतावा
हमेशा
ठीक से याद रहता है…

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