आँसुओं ने लिखी जो कथा, बाँच ले
ज़िन्दगी बस व्यथा ही व्यथा, बाँच ले।

रोशनी के क़दम दूर तक भी नहीं,
हर तरफ़ है तमस की प्रथा, बाँच ले।

टूटकर वो बिखरने लगा आजकल,
किस क़दर हादसों ने मथा, बाँच ले।

शर्त पर आजकल लोग जीने लगे,
रोज़ बिकने लगी आस्था, बाँच ले।

मैंने सीधे सरल भाव से सब लिखा,
तू जो चाहे अगर, अन्यथा बाँच ले।

ये ग़ज़ल देखने में है सादा ग़ज़ल,
दिल से महसूस कर ले तथा बाँच ले।

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संजय विद्रोही
कवि एवं कहानीकार

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