सफ़ेद मूँछें, सिर पर उतने ही सफ़ेद छोटे-छोटे बाल
बूढ़े दुबले झुर्रीदार बदन पर मैली धोती और बनियान
चेहरा बिल्कुल वैसा जैसा अस्सी प्रतिशत भारतवासियों का
शहर के बीच सिनेमा के पास वह
ज़मीन पर नक़्शे, बायोलॉजी, गणित और बारहखड़ी के चार्ट बेच रहा है

नक़्शे और चार्ट काफ़ी जगह घेरते हैं
बूढ़े का उन तक हाथ नहीं पहुँचता
इसलिए उसके पास एक लड़की है दस-ग्यारह बरस की
घरेलू लड़कियों की तरह दुबली बड़ी-बड़ी सहमी सफ़ेद आँखों
लेकिन सहज मुस्कान वाली
वह उसकी नातिन है या धेवती, नहीं कहा जा सकता
मगर इतवार का दिन है और तय है कि उसका दिल
खेलों और सहेलियों को याद कर रहा होगा

बूढ़ा उसे ग्राहकों की फ़रमाइश पर
इस नक़्शे या उस चार्ट को दिखाने को कहता है
यह नहीं कि नक़्शों में लड़की की कोई दिलचस्पी नहीं है
लेकिन आदमी-औरतों की माँसपेशियों और शिराओं वाले
बायोलॉजी के चार्टों को दिखाते हुए
वह ख़ुद उन्हें देखने में शामिल हो जाती है
आसपास रुमाल, कमीज़, टेरीकॉट, सॉफ़्टी
और लॉटरी बेचनेवालों का शोर है
भीड़ उसी तरफ़ ज़्यादा है लेकिन ऐसे लोग भी हैं
जो बूढ़े के नक़्शों और चार्टों में दिलचस्पी रखते हैं

क्या हरयाना का नक़्शा रखते हो?
इण्डिया को रेलवे मैप होगा?
फ़ीमेल एनॉटमी का इन-डैप्थ चार्ट है क्या
कॉलेज के दो लड़के हँसकर पूछते हैं
एक विदेशी लड़की को शहर का नक़्शा मिल गया है
वह मुस्कराकर एक जगह उँगली रखकर मित्र से कहती है
वी आर हियर और कुछ समझकर
छोटी लड़की पंजों के बल खड़ी होकर देखती है कि उसकी दुकान कहाँ है

दोपहर के तीन बज रहे हैं
कि दूर नुक्कड़ से जैसे किसी आँधी में बुहारे गए
रुमाल, पैन, चश्मे, टेरीकॉट और अण्डरवियर वाले
अपनी-अपनी गठरियाँ उठाये इस तरफ़ भागते हुए आते हैं
मुनिस्पल कमेटी का उड़नदस्ता आ गया है
इन ग़ैरक़ानूनी दुकानों को पकड़ने के लिए

दोनों भागते हैं अपनी दुकान लिये सिनेमाघर के पीछे
कई नक़्शे और चार्ट फिर भी पीछे छूट गए हैं
उड़नदस्ते के सिपाही और इंसपैक्टर उन्हें अपने क़ब्ज़े में लेते हैं
शहर सूबे मुल्क और संसार
और मर्दों और औरतों के शरीरों की बनावट के चार्ट
ज़ब्त कर लिये जाते हैं एक गठरी में
और जब दबिश ख़त्म होती है और कारिंदे ट्रक में बैठकर लौटते हैं
तब उन्हें एक-दूसरे को दिखाते हैं
देख सेहर मुलक आदमी और औरत अपने हात्थ में हैं

बूढ़ा और लड़की अपने आश्रय से गर्दन बाहर निकालते हैं
वह लड़की को भेजता है कि देखकर आए
वह लौटकर बताती है कि थोड़ा-सा माल सड़क पर उड़ा पड़ा है
सरकार, कमेटी और दुनिया को गालियाँ बकता हुआ
बूढ़ा चादर लिये लौटता है अपने ठिये पर, गाहक फिर आ रहे हैं
कुछ चीज़ें ऐसी हैं तमाम चीज़ों के बावजूद जिनकी ज़रूरत नहीं बदलती
जैसे नक़्शे, इबारत, गिनती और आदमी के शरीर की बनावट की तस्वीरें
जिन्हें बूढ़ा और लड़की फिर बेच रहे हैं
वापस अपने नक़्शे में अपनी जगह पर।

***

विष्णु खरे की कविता 'अकेला आदमी'

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विष्णु खरे
विष्णु खरे (२ फरवरी १९४० – १९ सितम्बर २०१०) एक भारतीय कवि, अनुवादक, साहित्यकार तथा फ़िल्म समीक्षक, पत्रकार व पटकथा लेखक थे। वे हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखते थे। वे अंग्रेजी साहित्य को विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाते थे। उन्होंने साहित्य अकादमी में कार्यक्रम सचिव का भी पद सम्भाल चुके हैं तथा वे हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स के लखनऊ, जयपुर तथा नई दिल्ली में सम्पादक भी रह चुके थे।

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