वह रोती बहुत थी!

‘Wah Roti Bahut Thi’, a poem by Nidhi Agarwal

अशक्त सा महसूस करने लगी थी
सुबह बच्चों को स्कूल भेजने की
नहीं होती थी हिम्मत।
टिफ़िन बनाते जाने क्यों
आँखें भर आती थीं।

तुम कहते थे- खुराक बढ़ाओ
मैं हँसती कि फिर
मशीन भी वज़न बढ़ा देगी
पूरे दिन का सुकून
मशीन पर वज़न की घटती
संख्या भर थी।

कौन सा दुख
किस सुख के आवरण में
लिपट जीवन को ठगता है….
हम कब जान पाते हैं?
अनिश्चितताओं का दंश
है सम्पूर्ण जीवन।

गिरता वज़न शरीर में बढ़ती
अनवांछित कोशिकाओं की
वृद्धि की अनसुनी दस्तक थी।

कितने ही चिकित्सक, जाँचों
और अस्पतालों ने एकमत हो
गोद दिया था मेरे माथे पर वह शब्द-
कैंसर!!
वे कहते हैं- मैं रोती बहुत हूँ।
टेंशन पेशेंट हूँ।
वे और उनकी मशीनें
देख पाते हैं बस
बीमारी को मेरा शरीर जकड़ते हुए
कोई है क्या ऐसा सी टी, एम आर आई
जो भाँप ले बीमारी को
मेरे जीवन के सब सुख निगलते हुए।

दर्पण अब मुझे नहीं पहचानता
अब हर रात तुमको कुछ और
कसकर पकड़ सोती हूँ।
छोटा अभी चार साल का है,
मेरे आँचल में मुँह ढाँप सोने का आदी।
मेरे जाने के बाद कौन बरसाएगा इसकी शरारतों पर स्नेह?
कौन करने देगा इसे
मन भरकर समय की बर्बादी?

बड़ी ने चौदहवें में रखा है
पहला क़दम।
(ये और बात कि केक किसी होटल नहीं अस्पताल में कटा है)
हर क़दम पर कौन थामेगा उसके
लड़खड़ाते क़दम?
कौन खिलते रूप की रोज़
बलैया लेगा?

घूमकर तुम पर ठहरती है फिर
मेरी नज़र।
तुम्हें तो यह तक नहीं मालूम कि
भूरी पेंट के संग ग्रे कमीज नहीं चलती।
रुमाल निकालने अभी भी खोलते हो
दाहिनी दराज़
जो पिछले बरस से बन चुकी है
दवाईयों का संग्रहालय।

सदा के ही भुलक्कड़ हो!
भूलते रहे हो
हमारी सालगिरह…
बच्चों की क्लास…
और उनकी परीक्षा की तिथि भी।
कल रात भी भूल गए थे तुम
अपना फ़ोन लॉक करना।

नॉटिफ़िकेशन साउंड पर फोन उठा
देखने लगी एफ़बी पर तुम्हारी नई डीपी
तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी दिलायी
नीली कमीज़ में सदा खिल से जाते हो तुम।
तभी मैसेंजर के नॉटिफ़िकेशन्स से जाना कि
डीपी बदलने जितना ही सरल है
आजकल…
रिश्तों में निष्ठा का बदलते रहना।
तुम्हें हर रात लव यू कहने वाली शोना, जाने क्यों कुछ सही नहीं लगती
बेहतर होगा उससे सम्भल कर रहना!

जीवनसाथी पर तुम्हारे प्रोफ़ाइल में
डिवोर्सी लिखा देख कुछ अंदर चटका तो
पर शुक्रिया! तुम्हारा उपकार है मुझ पर
मन से सम्बन्ध-विच्छेद कर भी तुम्हारा मेरे यूँ साथ होना।
आँखें भीगी थीं ‘नो किड’ पढ़कर
कैसा भरा-पूरा दिखता था जीवन
जो निकला बस एक सलोना सपना

प्रतिदिन मुझसे दूर होते हुए भी
हो सके तो ठहरना मेरी
अंतिम विदा तक।
जलती लपटों के धुएं से मसल
अपनी आँखें
जो कोई बोले कि वह रोती बहुत थी
उसको कहना-
वह बीमारी से नहीं रोती थी।
उसे उसके अपनों ने छला है।
मृत्यु से डर नहीं रोई थी कभी वह।
वह रोती थी अपने मासूम बच्चों के लिए
जिनके आगे विषमताओं से भरा
निर्दयी जीवन खड़ा है।
माँ का जाना वह सह भी लेते लेकिन
एक बीमारी ने उनसे
माँ और पिता दोनों को ही
हर लिया है।