कहीं तो वक़्त की भी खेती होती होगी
शब्ज ओ बाग़ में वक़्त की भी कलियाँ खिलती होंगी
या कोई तो ऐसी मिल होगी
जहाँ वक़्त के रेशों की बुनाई होती होगी
कहीं तो बनता होगा, फिर बंटता होगा

तुम्हारे हिस्से कुछ, मेरे हिस्से कुछ
कुछ तग़ाफ़ुल, कुछ तसव्वुर,
कुछ फ़िक्र, कुछ ख़्याल
सबके हिस्से आता होगा
न रुकती है कभी इसकी पैदावार
न थमती है कभी बुनाई
अगर मिल जाए पता उस खला का
कहाँ बनता है वक़्त यह बला का

और मिल जाए कोई हवाई जहाज़
जो प्रकाश वर्षों की गति से चलता हो
तो लम्हों के कुछ बीज मैं भी
बो आऊं,
थोड़ा रो आऊं
रिश्तों की कुछ नमी सिकोड़ आऊं
और जो नन्ही कलियाँ खिलेंगी
तोड़ आऊं उन्हें
और लौट आऊं
उसी वक़्त में
उन्हीं लम्हों में

जहाँ मासूमियत रेंग के उम्र
के ग़मगीन पड़ाव पर न पहुँचती हो
जहाँ सजदों में हसरतों की ख़ातिर
गिरना न पड़े..
सोचता हूँ कुछ बीज मैं भी
वक़्त के बो आऊं..
कहीं तो ऐसी जगह होगी
कहीं तो…

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