कवि: जॉन गुज़लॉस्की
अनुवाद: देवेश पथ सारिया

युद्ध तुम्हें मार देगा
और ठण्डा पड़ा छोड़ देगा तुम्हें
गलियों में
या खेतों में
बमों से विध्वंस हुई इमारतों की
ईंटों की तरह

पर चिन्ता न करो
फिर शान्ति आएगी
तुम्हें दफ़ना देगी वह
और बैठ जाएगी तुम्हारे ऊपर
तुम्हारी माँ की तरह रोती हुई,
दुआ माँगती हुई
तुम्हारी वापसी की

बुदबुदाएगी
जैसे कि वह करती थी तब
जब तुम लड़के थे,
नाश्ते से पहले
धारा में अपने
मुँह-हाथ धोते थे

वह रोएगी
जब तक
ईश्वर एक चमत्कार न कर दे
और तुम उठ जाओगे
सुनहरी किरणों
और चहचहाते पक्षियों के बीच

और फिर
युद्ध लौट आएगा
और तुम्हें मार देगा।

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देवेश पथ सारिया
बतौर रचनाकार मैं मुख्य रूप से हिन्दी कवि हूं। अनुवाद कार्य एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी कुछ रुचि रखता हूँ। साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, अकार, बया, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, उद्भावना, जनपथ, नया पथ, आधारशिला, दोआबा, बहुमत, परिंदे, ककसाड़, प्रगतिशील वसुधा, अक्षर पर्व, मंतव्य, मुक्तांचल, रेतपथ, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, उम्मीद, कला समय, पुष्पगंधा आदि पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, शब्दांकन, कारवां, अथाई, हिन्दीनामा, लिटरेचर पॉइंट। सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध। ई-मेल: [email protected]