प्रेमचंद

प्रेमचंद
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प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी।

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Ahmad Nadeem Qasmi

एक दरख़्वास्त

ज़िन्दगी के जितने दरवाज़े हैं, मुझ पे बंद हैं देखना— हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़कर देखना भी जुर्म है सोचना— अपने अक़ीदों और यक़ीनों से निकलकर सोचना...
Prabhat

हमें नहीं पता

तुम अगर मिल सकती होतीं या मैं तुमसे मिल सकता होता तो ज़रूर मिल लेते बावजूद हमारे बीच फैले घने कोहरे के इसी में ढूँढते हुए हम एक-दूसरे...
Kirti Chaudhary

सुख

रहता तो सब कुछ वही है ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले... बदलता तो कुछ भी नहीं है। लेकिन क्या होता है कभी-कभी फूलों में रंग उभर आते हैं मेज़पोश-कुशनों...
Women at beach

मन का घर, तुमसे विलग होकर

मन का घर उसके मन के घर में गूँजती रहती हैं टूटती इच्छाओं की मौन आवाज़ें उसमें हर बालिश्त दर्ज होती जाती है छूटते जा रहे सपनों से पलायन की एक लम्बी...
Bashar Nawaz

वक़्त के कटहरे में

सुनो तुम्हारा जुर्म तुम्हारी कमज़ोरी है अपने जुर्म पे रंग-बिरंगे लफ़्ज़ों की बेजान रिदाएँ मत डालो सुनो तुम्हारे ख़्वाब तुम्हारा जुर्म नहीं हैं तुम ख़्वाबों की ताबीर से...
Giriraj Kishore

नायक

'रिश्ता और अन्य कहानियाँ' से आँगन में वह बाँस की कुर्सी पर पाँव उठाए बैठा था। अगर कुर्ता-पाजामा न पहने होता तो सामने से आदिम...
Love, Couple

नीरव की कविताएँ

1 ढहते थे पेड़ रोती थी पृथ्वी हँसता था आदमी मरती थी नदी बिलखता था आकाश हँसता था आदमी टूटता था संगीत बुझता था प्रकाश हँसता था आदमी टूट रहा है आदमी बुझ रहा है...
Dilawar Figar

दावतों में शाइरी

दावतों में शाइरी अब हो गई है रस्म-ए-आम यूँ भी शाइर से लिया जाता है अक्सर इंतिक़ाम पहले खाना उसको खिलवाते हैं भूखे की तरह फिर उसे करते...
Bharat Bhushan

मन, कितना अभिनय शेष रहा?

मन, कितना अभिनय शेष रहा? सारा जीवन जी लिया, ठीक जैसा तेरा आदेश रहा! बेटा, पति, पिता, पितामह सब इस मिट्टी के उपनाम रहे, जितने सूरज उगते देखो उससे ज़्यादा संग्राम...
Mohammad Alvi

मैं और तू

ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि मैं तुझसे नज़रें मिलाऊँ तिरी शान में कुछ कहूँ तुझे अपनी नज़रों से नीचे गिराऊँ ख़ुदा-वंद... मुझ में कहाँ हौसला है कि...
Vishnu Khare

अकेला आदमी

अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लोग...
Ambar Bahraichi

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई एक शकरा पास ही...
Malkhan Singh

मुझे ग़ुस्सा आता है

मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना आया है कि जोरू मैला...
Bulbbul - a comment

सीता और काली की बाइनरी से अछूती नहीं है ‘बुलबुल’

मनोरंजन के 'तीसरे' परदे के रूप में उभरे नेटफ़्लिक्स पर आयी फ़िल्म 'बुलबुल' इन दिनों ख़ूब चर्चा में है। चर्चा का मुख्य विषय है...
Silent, Silence

इतिहास की कालहीन कसौटी

बन्‍द अगर होगा मन आग बन जाएगा, रोका हुआ हर शब्‍द चिराग़ बन जाएगा। सत्ता के मन में जब-जब पाप भर जाएगा झूठ और सच का सब अन्‍तर मिट जाएगा न्‍याय...
Waiting, Train, Girl, Window, Thinking, Alone, Lonely

बेटिकट

एक ट्रेन का सपना देखता हूँ मैं जो अतीत के किसी स्टेशन से छूटती है और बेतहाशा चलती चली जाती है समय की किसी अज्ञात दिशा में मैं सवार...
Javed Akhtar

मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
Writing

समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार

जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
Ahmad Faraz

ख़्वाबों के ब्योपारी

हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...
Agyeya

यूरोप की छत पर : स्विट्ज़रलैण्ड

दुनिया की नहीं तो यूरोप की छत : अपने पर्वतीय प्रदेश के कारण स्विटजरलैण्ड को प्रायः यह नाम दिया जाता था—किन्तु हिमालय को घर...
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