सुरेश जिनागल

सुरेश जिनागल
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(जन्म: 1995, चूरू, राजस्थान) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मारवाड़ी लोकगीतों पर शोधरत। कविता के क्षेत्र में नये।

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Kedarnath Agarwal

प्रश्न

मोड़ोगे मन या सावन के घन मोड़ोगे? मोड़ोगे तन या शासन के फन मोड़ोगे? बोलो साथी! क्या मोड़ोगे? तोड़ोगे तृण या धीरज धारण तोड़ोगे? तोड़ोगे प्रण या भीषण शोषण तोड़ोगे? बोलो साथी! क्या...
Rajesh Joshi

पृथ्वी का चक्कर

यह पृथ्वी सुबह के उजाले पर टिकी है और रात के अंधेरे पर यह चिड़ियों के चहचहाने की नोक पर टिकी है और तारों की झिलमिल लोरी पर तितलियाँ...
Harivansh Rai Bachchan

कवि के मुख से : मधुशाला

ऑल इण्डिया रेडियो, लखनऊ, से प्रसारित, 1941 मेरी सबसे पहली रचना 'तेरा हार' 1932 में प्रकाशित हुई थी। उसकी प्रशंसा मैंने पत्रों में पढ़ी थी...
Dictatorship

सुनो तानाशाह!

सुनो तानाशाह! एक दिन चला जाऊँगा एक नियत दिन जो कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा में बैठा है मेरी जिजीविषा का एक दिन जिसका मुझे इल्म तक नहीं है— क्या...
Bhagat Singh

सत्याग्रह और हड़तालें

'भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़' से जून, 1928 'किरती' में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं। भगतसिंह 'किरती' के सम्पादक मण्डल...
Mahadevi Verma

नारीत्व का अभिशाप

'शृंखला की कड़ियाँ' से चाहे हिन्दू नारी की गौरव-गाथा से आकाश गूँज रहा हो, चाहे उसके पतन से पाताल काँप उठा हो परन्तु उसके लिए...
Sheen Kaaf Nizam

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा

कभी जंगल, कभी सहरा, कभी दरिया लिख्खा अब कहाँ याद कि हम ने तुझे क्या-क्या लिख्खा शहर भी लिक्खा, मकाँ लिक्खा, मोहल्ला लिखा हम कहाँ के थे...
Naresh Saxena

ईंटें

तपने के बाद वे भट्टे की समाधि से निकलीं और एक वास्तुविद के स्वप्न में विलीन हो गईं घर एक ईंटों भरी अवधारणा है जी बिलकुल ठीक सुना...
Sarveshwar Dayal Saxena

अन्त में

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता, सुनना चाहता हूँ एक समर्थ सच्ची आवाज़ यदि कहीं हो। अन्यथा इससे पूर्व कि मेरा हर कथन हर मंथन हर अभिव्यक्ति शून्य से टकराकर फिर वापस लौट...
Vijaydev Narayan Sahi

मेरे साथ कौन आता है

मेरे साथ कौन आता है? मैं फिर उन कांतारों की यात्रा करने जा रहा हूँ जहाँ बरसों में भटक चुका हूँ। मैं मानता हूँ कि वहाँ मेरे...
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