चलो विस्थापित हो जाएँ कहीं
दिखावटी मुखौटों से दूर,
दम घुटता है यहाँ
विचारों की अशुद्धता में-
यह महामारी का दौर है।

जब टूट रही थीं साँसें
घिनौनी मानसिकता का ही
वज़न है अब वक़्त पर-
यह महामारी का दौर है।

सरवाइवल ऑफ़ फ़िटेस्ट के सिद्धान्त को
परास्त करने के प्रयास में है
हर बार की तरह
पतनशील विचारधारा-
यह महामारी का दौर है।

मन्दिर और मस्जिद,
गुरद्वारे तथा गिरजाघर
आइसोलेशन में हैं
और क्वॉरंटीन में चले गए हैं
सभी के अपने-अपने आराध्य,
यह कैसा दौर है?

अपने खेतों से दूर
सो गए हैं देश के अन्नदाता,
नंगे पाँव चल पड़े कामगार
अश्रुधारा बहा रहे असहाय
बिलख रहे नौनिहाल
और भूख के बोझ से
द्रवित है वसुन्धरा,
लुप्त हो रही मानवता
युद्धरत है व्यवस्था उनके लिए
जो या तो भूख से मरेंगे
या फिर वैश्विक साजिश से-
यह महामारी का दौर है।

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