मैं जब भी यथार्थ का पीछा करता हूँ
देखता हूँ वह भी मेरा पीछा कर रहा है, मुझसे तेज़ भाग रहा है
घर हो या बाज़ार, हर जगह उसके दाँत चमकते हुए दिखते हैं
अंधेरे में, रोशनी में
घबराया हुआ मैं नींद में जाता हूँ तो वह वहाँ मौजूद होता है
एक स्वप्न से निकलकर बाहर आता हूँ
तो वह वहाँ भी पहले से घात लगाए हुए रहता है

यथार्थ इन दिनों इतना चौंधियाता हुआ है
कि उससे आँखें मिलाना मुश्किल है
मैं उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ता हूँ
तो वह हिंस्र जानवर की तरह हमला करके निकल जाता है
सिर्फ़ कहीं-कहीं उसके निशान दिखायी देते हैं
किसी सड़क पर जंगल में पेड़ के नीचे
एक झोपड़ी के भीतर एक उजड़ा हुआ चूल्हा, एक ढही हुई छत
छोड़कर चले गए लोगों का एक सूना घर

एक मरा हुआ मनुष्य इस समय
जीवित मनुष्य की तुलना में कहीं ज़्यादा कह रहा है
उसके शरीर से बहता हुआ रक्त
शरीर के भीतर दौड़ते हुए रक्त से कहीं ज़्यादा आवाज़ कर रहा है
एक तेज़ हवा चल रही है
और विचारों, स्वप्नों, स्मृतियों को फटे हुए काग़ज़ों की तरह उड़ा रही है
एक अंधेरी-सी, काली-सी चीज़
हिंस्र पशुओं से भरी हुई एक रात चारों ओर इकट्ठा हो रही है
एक लुटेरा, एक हत्यारा, एक दलाल
आसमानों, पहाड़ों, मैदानों को लाँघता हुआ आ रहा है
उसके हाथ धरती के मर्म को दबोचने के लिए बढ़ रहे हैं

एक आदिवासी को उसके जंगल से खदेड़ने का ख़ाका बन चुका है
विस्थापितों की एक भीड़
अपनी बचीखुची गृहस्थी को पोटलियों में बांध रही है
उसे किसी अज्ञात भविष्य की ओर ढकेलने की योजना तैयार है
ऊपर आसमान में एक विकराल हवाई जहाज़ बम बरसाने के लिए तैयार है
नीचे घाटी में एक आत्मघाती दस्ता
अपने सुंदर नौजवान शरीरों पर बम और मिसालें बांधे हुए है
दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष अंगरक्षक सुरक्षागार्ड सैनिक अर्धसैनिक बल
गोलियों, बन्दूक़ों, रॉकेटों से लैस हो रहे हैं
यथार्थ इन दिनों बहुत ज़्यादा यथार्थ है
उसे समझना कठिन है, सहन करना और भी कठिन।

मंगलेश डबराल की कविता 'उस स्त्री का प्रेम'

Book by Mangalesh Dabral: