घोर सन्नाटे को खुद में समेटे हुए,
सर्द हवाओं को खुद में लपेटे हुए,
किसी को नींद की आगोश में ले जाते हुए,
ये रात कुछ कह रही है क्या?
कोई बात अधूरी रह रही है क्या?

कुछ लिखना था शायद मुझे आज,
तारीफों के लय में बांधना था तुझे आज,
तेरी पायल, बिन्दी सब बयाँ कर डालता लफ़्ज़ों से,
पर मेरी कलम वैसे ही बह रही है क्या?
कोई बात अधूरी रह रही है क्या?
ये रात कुछ कह रही है क्या?

कुछ आवाज़ें जो साफ ज़ाहिर हैं अभी ,
हम रात के बाशिंदे, इनमें माहिर है अभी,
घड़ी की टिक-टिक हो या धड़कनों की धक-धक,
ये खामोशी इन्हें सह रही है क्या?
कोई बात अधूरी रह रही है क्या?
ये रात कुछ कह रही है क्या?

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अभिषेक द्विवेदी
आधा अधूरा लेखक ✒️

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