‘Zabaanon Ka Bosa’, a poem by Fahmida Riaz

ज़बानों के रस में ये कैसी महक है
ये बोसा कि जिससे मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू
ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है
ये कैसा नशा है
मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है
तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो
ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा
अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है
कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा
मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी
वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है
मुझे ऐसा लगता है
तारीकियों के
लरज़ते हुए पुल को
मैं पार करती चली जा रही हूँ
ये पुल ख़त्म होने को है
और अब
उस के आगे
कहीं रौशनी है…

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Book by Fahmida Riaz:

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फ़हमीदा रियाज़
फ़हमीदा रियाज़ उर्दू की प्रमुख शायरा एवं लेखिका हैं। इनका जन्म 28 जुलाई 1946 को मेरठ में हुआ। बाद में इनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। गोदावरी, ख़त-ए-मरमुज़ इनके प्रमुख संग्रह हैं। 1980 के दौर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक के शासन में उनको और उनके पति को निर्वासन के बाद भारत में शरण लेनी पड़ी थी।