ज़ख़्मी गाल

‘Zakhmi Gaal’, a poem by Rahul Boyal

जब मैं उससे मिला
उसकी आँखें भर आयीं
मुझे ख़बर ही न पड़ी
कब मेरा सीना ख़ाली हो गया
मैंने बस उसे इतना ही कहा था
जब गाल ज़ख़्मी हों
तब रोना नहीं चाहिए।

उसने भी मुझे इतना ही कहा
जब आँखों से नमक गिराने का मौसम हो
तब गालों को ज़ख़्मी नहीं होना चाहिए
गाल चाँटों से कभी ज़ख़्मी नहीं होते
अक्सर गाल उन चुम्बनों से छिल जाते हैं
जिनकी ख़्वाहिश तो गाल करते हैं
पर ठहर वो होठों पर जाते हैं।

वह देर तक जाने क्या बोलती रही
मगर जब तक वह बोलती रही
उसका गला रुंधता गया
मैं देर तक जाने क्या सुनता रहा
मगर जब तक सुनता रहा
मेरा सर झुकता गया।

आदमी के मलबे में
औरत के सपनों की
शिनाख़्त होनी चाहिए
न कि औरत के सपने में
आदमी के मलबे की
टूटने के बाद सपने भी
मलबे में तब्दील हो जाते हैं।

जिस्म को खंगालते-खंगालते
एक दिन आदमी लोथड़ा हो जाता है
आदमी को लोथड़ा होने से बचना चाहिए
औरत को मलबा होने से

अबकी बार जब मैं मिलूँगा
उम्मीद है उसका दिल भर आये
और मेरी आँखें,
इस बार ज़ख़्मी होने की
मेरे गालों की बारी है।

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