कोई इतना ख़ामोश सा मिला है मुझे कि मैं अपनी ख़ामोशी खो बैठा हूँ

क्या हमारा कुनबा इतना हताश और निहथा हो गया है कि मैं ख़ुद हताश हो गया हूँ

कल जिसकी आँखों में इतनी चमक थी वो आज इतना बेबस सा क्यूँ नज़र आ रहा था?

क्या वक़्त ने उसे भी हरा दिया है क्या?

लगता है किसी आतंकी पुतले ने सेंध मारी है जिसने हमारे साहसी सैनिक को बेढाल कर दिया है।

सुना है वक़्त माँगा है उसने मेरे सैनिक का इस्तक़बाल करने के लिए।

फिर भी वो चुप चाप है, बेरंग है और उसे अभी भी ख़ुद की चिंता नही सता रही।

कल रात भी वो उसका हाल जानने के लिए बेचैन था।

ऐसा क्या जादू है उन पुतलों की जादूगरी में कि भावनाओं को पूजने वाला सिपाही हंस कर हर ज़ख़्म को सह रहा है

सोचता हूँ नफ़रत से भर दूँ इस सारे ज़माने को क्यूँकि वो भी शायद वही वक़्त माँग रही है जिस तरह से मेरे आतंकी पुतले ने माँगा था

कहीं अपना साथी टूट ना जाए इस डर से यह सब केवल लिख रहा हूँ

उसको पुतला बोला है डर रहा हूँ कही अपना साथी रूठ न जाए यह सोच कर सिहर रहा हूँ!

रजत परमार
लेखक बनने की कतार में