लतीफ़ा

इस गूचे की वही कहानी, जो उस गूचे कह आये थे।
अपने कह ली, अपने सुन ली, अपने को ही बहलाये थे।
इस बारी भी वही तमाशा जो उस बारी दिखलाये थे।
हम भी हंस ले, वो भी हंस ले, लतीफ़ा जो बन आये थे।

कुछ बेरुखियाँ भी सह ली, कुछ उखड़ी निगाहें भी।
कई ग़म दफन भी कर लिए थे, कुछ मुस्काने दिखाई थीं।
हम ही मसखरा हो लिए, हम ही तमाशबीन भी।
फिकरें सारी भूल लिए, और बेपरवाही आज़माई थी।

इस दफ़े भी वही नज़ारे, जो उस दौर में नवाज़े थे।
कुछ ने देखी, कुछ अनदेखी, कुछ बस नज़र दौड़ाये थे।
इस मर्तबा भी वही असलियत, जो उस मर्तबा सुनाये थे।
तब भी जाने, अब भी जानो, बेनकाबी जो अपनाये थे।