मैं अपने ही मन का हौंसला हूँ

मेरी ये कविता ‘ पोषम पा’ को समर्पित है उनके इस प्रयास के लिए!

सूख गयी है शब्दों
की आँखों की नमी
जहाँ बहा करती थी नितांत
कई सदियों से एक नदी

नहीं है अब इन शब्दों में
व्यंग के कटाक्ष का वो बाण
जो बेध देता था रूह को

न अब इन शब्दों में वो धार है
जिससे पड़ जाती थी दरारें
पहाड़ों के सीने में

और अब इनमें वो हुनर भी
नहीं रहा रूठी प्रियसी को
मनाने का

मेरे बुलाने पर पीछे मुड़ के
भी नहीं देखते ये शब्द अब

न ही बुलावे पर आते
हैं मिलने, जैसे भाग के
आया करते थे पहले

क्या मेरी कविताएँ बिता देंगी
इनके इंतज़ार में अब सारी रातें
जागकर?

नहीं… बिलकुल नहीं…

मैं अपने ही मन का हौंसला हूँ
उठाके मशालें दोनों हाथों में
चल दूँगा
कर दूँगा पैरों से ज़ख्मी ज़मीन पर
ढूँढूँगा फिर नए शब्द
शहर-शहर
गाँव-गाँव
जंगल-जंगल
सहेरा-सहेरा

और ढूँढ लाऊँगा
वो शब्द
जिनकी आँखों में होगी शर्म
और जिगर में क़त्ल करने का हौंसला

‘मैं अपने ही मन का हौंसला हूँ!’