मिथकों से रचनात्मक रिश्ता बनाना होगा!

मिथक को समझने और देखने के लिए बड़ी सलाहियत की ज़रूरत होती है। जब हम मिथक को यथार्थ की तरह देखते हैं तो हम यथार्थ को यथार्थ की तरह देखना भूल जाते हैं। मिथक के साथ हम वैसा रिश्ता नहीं क़ायम कर सकते जैसा कि हम इतिहास के साथ क़ायम करते हैं। हमें इतिहास और मिथक के बीच के फ़र्क़ की तमीज़ पैदा करनी होगी क्यूँकि कभी भी मिथक के साथ एकमुखी रिश्ता नहीं होता। उससे बहुमुखी रिश्तों के तार बँधते हैं।

मैं नास्तिक हूँ। मुझे ईश्वर की ज़रूरत नहीं है। लेकिन मुझे संस्कृति की ज़रूरत है। मैं चाह कर भी उससे भिन्न नहीं हो सकता!

महाग्रंथ रामायण के नायक राम की मौजूदगी को हम नकार नहीं सकते। क्यूँकि राम सिर्फ़ एक शख़्सियत नहीं, उनकी अलग-अलग व्याख्याएँ हैं- कहीं वो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो कहीं बस राजनीति के गलियारे में अकेले टहलते अपना अस्तित्व तलाशते हैं।

कबीर के राम बिलकुल अलग हैं। वे मात्र दशरथ पुत्र तक सीमित नहीं हैं। तुलसी के अपने राम हैं, वाल्मीकि के अपने। तीन सौ से अधिक रामायण लिखी गई हैं। सबके राम अलग अलग हैं। यहाँ तक कि रावण की भी अलग-अलग व्याख्या है- कहीं उसे राक्षस के रूप में बताया गया है तो कहीं उसे महापंडित कहा गया है। सीता के भी तमाम रूप हैं। वो सिर्फ़ जनक की बेटी नहीं बल्कि एक रामायण में उन्हें योद्धा की तरह लड़ते पेश किया गया है।

राम की आलोचना भी हुई है। आलोचना होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन ये भी सच है कि हम अपनी संस्कृति की आलोचना उसके भीतर रह के ही कर सकते हैं। हम उसका हिस्सा हैं, उससे सवाल करने के लिए हमें बाहरी बनने की ज़रूरत नहीं। जब जब हमने बाहरी बन संस्कृति पर प्रहार किया है तब तब उसका फ़ायदा दक्षिणपंथ ने उठाया है। और बात सिर्फ़ राम को स्वीकार या अस्वीकार करने तक की नहीं है। बात उसकी नए तरह की व्याख्या रचने की है। और हम इससे अपना हाथ छुड़ा के भाग नहीं सकते। मिथकों पे सभी के अलग अलग दाफे दर्ज हैं। राम के व्यक्तित्व का कोई एक आयाम नहीं, वो बहुआयामी है, उसकी तमाम परतें हैं…

प्रगतिशील लोगों की जमात हमेशा तथ्यों के बिनाह पे बात करती है लेकिन उन्होंने संस्कृति के नाम पर क्या दिया? आजतक एक भी त्यौहार होली या दीपावली के बराबर का नहीं रच पाए। वे किसी ऐसे नए संगीत की रचना नहीं कर पाए जो जन-जन तक पहुँचे तो फिर हम कैसे समाज को रचने की बात करते हैं।

आज के वक़्त में हमारे सामने अपनी संस्कृति और मिथकों के साथ रचनात्मक तौर पर एक रिश्ता कायम करने की चुनौती है। नहीं तो हम भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कट्टरपंथियों की समानांतर कतार में खड़े होंगे!