असंगघोष कृत ‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’

विवरण: हिन्दी दलित कविता में असंगघोष एक चर्चित नाम है। ‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ उनका नवीनतम कविता संग्रह है। एक ओर इस संग्रह की कविताएँ हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती हैं तो दूसरी ओर अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध प्रतिकार की चेतना का संचार करती हैं। इन कविताओं में सर्वत्र मनुष्यता की पहचान, मनुष्यता की माँग और मनुष्यता की कामना है। कवि का हृदय वर्जनाओं से मुक्त हो बग़ावत करने के लिए व्याकुल है। इस व्याकुलता में उसके ‘अन्तर्मन से निकलते हैं नफ़रतों भरे/बग़ावत के गीत’ और इन गीतों को वह ख़ुद पर ही आजमाता है। इन गीतों की अपनी भाषा है, अपनी लय, छन्द, जिनमें समता और स्वातन्त्रय की चाह और मनुष्यता की राह है। कवि समाज को यह अहसास कराना चाहता है कि समाज में सब कुछ सुन्दर ही नहीं है। बहुत कुछ असुन्दर और वीभत्स भी है, किन्तु इस असुन्दर और वीभत्स पर पर्दा है। असंगघोष की कविताएँ इस पर्दे को उघाड़कर समाज के उस असुन्दर और वीभत्स यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं। साथ ही, भेड़ की खाल में भेड़िए की पहचान, अभिजात्यता के आवरण में छिपे जातिवाद की पहचान, पद्मराष्ट्रवाद और देशभक्ति की पहचान भी ये कविताएँ कराती हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इन कविताओं के बीच में खड़ा मनुष्य अब साँस ले रहा है। यदि उसकी चेतना में आ रहे बदलाव को ठीक से समझा नहीं गया और उसकी आज की साँस कल हुंकार में भी बदल सकती है, इस आशय का अहसास भी असंगघोष की ये कविताएँ कराती हैं।

– जयप्रकाश कर्दम

  • Format: Hardcover
  • Publisher: Vani Prakashan (2018)
  • ISBN-10: 9387889475
  • ISBN-13: 978-9387889477