सरकारों के झोल

मेरा सिर झुक गया शर्म से,
देखकर भूख से तड़पता इंसान को,
ज़ुबान बाहर आ गई मेरे हलक से,
ग़रीबी के हालात में देख निकलती जान को

सरकार कहती है खज़ाना ख़ाली है,
ये कहना जनता के मुँह पे गाली है,
मैंने तो हर चीज़ पे कर चुकाया है,
साबुन, तेल या मेरी कमाई माया है,
फिर भी खज़ाना इनका ख़ाली पाया है,
कैसी समस्या घेरे है हिंदुस्तान को,
मेरा सिर झुक गया शर्म से…

सरकारी तनख़्वाह समय पर आती,
मज़दूर की मज़दूरी घटती ही जाती,
क्या बताऊँ मिट्टी में मिल गई जवानी,
सरकारें कर रही हैं अपनी मनमानी,
जनता को मूर्ख समझे जनता है ज्ञानी,
भूल गए आज़ादी के उस वरदान को,
मेरा सिर झुक गया शर्म से…

फ़िल्मी सितारे करोड़ों में कमाते भाई,
हवाई जहाज़ों में घूमें इतनी है कमाई,
वो बच्चा भला किसे सुनाए अपना दुखड़ा,
चुराता पकड़ा जाये जो रोटी का टुकड़ा,
देखने वाला होता है उसका मासूम मुखड़ा,
कोई तो हल बता मौला यशु जान को,
मेरा सिर झुक गया शर्म से…