रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ‘द विक्ट्री’

रवीन्द्रनाथ टैगोर, रचनाधर्मिता के विशाल फ़लक का नाम है। उनकी सृजन चेतना काल की सुदीर्घ दूरियों के बाद भी कभी चौंकती है, कभी उद्वेलित करती है और कभी जीवन के अंधेरों कोनों को प्रकाशित करने के लिए किसी रोशनी का सुराग थमा जाती है। आइए पढ़ें प्रेम, विजय, सत्य, स्वीकार, शब्द, संगीत, स्वर और संवेदना को लेकर बुनी गई कहानी!

Story: ‘The Victory’ – Rabindranath Tagore
अनुवाद: उपमा ‘ऋचा’ 

वो राजकुमारी अजीता थी और राजा नारायण के दरबारी कवि शेखर ने उसे कभी देखा नहीं था। (लेकिन) दरबार में अपनी नई कविता सुनाते हुए वह जानबूझकर अपने स्वरों को तार सप्तक तक केवल इसीलिए पहुंचा देता था, ताकि उसके शब्द दरबार के दूसरे तल्ले में परदे के पीछे छिपी बैठी अनदेखी मूरत तक पहुंच सकें। वह अपने गीत सितारों के पार पहुंचा देना चाहता था। जहां उसकी किस्मत लिखने वाले अज्ञात अपरिमित ग्रह-नक्षत्र रोशनी से घिरे खड़े थे।

वह परदे के पीछे से गुजरती परछाई को देखता। दूर से एक धीमा सा संगीत उसके कानों को छू जाता और वह उन पायलों की कल्पना करने लगता, जिनके स्वर्ण नूपुरों की झंकार हर पग पर एक नया गीत गाती थी। आह वह गुलाबी पैर धरती पर यूं पड़ते थे, जैसे ईश्वर की कृपा झरती हो। कवि ने इन स्वर्ण नूपुरों की झंकार को अपने हृदय में स्थापित कर रखा था, जहां वो अपने शब्द समर्पित करता था। सितारों से संवाद करते शेखर के मन में कभी यह संदेह अथवा प्रश्न खड़ा नहीं हुआ कि पर्दे के पीछे से गुजरने वाली वो छवि किसकी है? या वो किसके नूपुरों का स्वर है, जो उसके हृदय को झंकृत किए रहते हैं? वह तो किसी साधक की तरह अनदेखी छवि से लिपटी रुनझुन में खो चुका था।

राजकुमारी की सेविका मंजरी, नदी पर जाते हुए रोज ही शेखर के घर के निकट से गुजरती थी और उसको एक भी दिन अपनी नटखट बातों से अछूता न रहने देती। जैसे ही वह देखती कि रास्ता खाली है और परछाइयां रास्तों में घुलने लगी हैं, वो झटके से शेखर के कमरे में आ जाती और उसके आसन के पास बैठ जाती। मंजरी के बालों में गुंथे फूलों और उसके घूंघट के रंग का चयन इतनी सावधानी से किया जाता था कि कई बार लगता वो जानबूझकर फूलों के रंग को घूंघट में घोलकर आती है। लोग उसकी इस बात पर मुस्कुराते, कानाफूसी करते और ताने भी कसते थे, लेकिन शेखर ने कभी इस बात को छिपाने का प्रयास नहीं किया कि मंजरी के साथ होने वाली बैठकें उसके लिए केवल मन:संतोष के क्षण थे।

शेखर उसे बसंत की गंध कहता था। जिस पर मंजरी की सरल साधारण आत्मा इठला कर झूम उठती। कौन जाने वो उस गंध का प्रभाव था या उन नूपुरों की झंकार, लेकिन उन दिनों बसंत की प्रशंसा में लिखे गीत शेखर बार-बार दोहराए जा रहे थे। राजा जब उन्हें सुनता और मुस्कुरा देता, प्रत्युत्तर में कवि भी मुस्कुराने लगता।

कभी राजा प्रश्न करता, “क्या बसंत के दरबार में गुनगुनाना ही मधुप का कार्य हैं?”

तो कवि उत्तर देता, “नहीं, बसंती फूलों से झरते मधु को पीना भी उसका कर्तव्य है।” और दरबारी हंसने लगते।

अफवाह तो ये भी थी कि अपनी सेविका द्वारा कवि के दिए संबोधन को स्वीकारने की बात पर राजकुमारी भी हंसती थी, किंतु अपने हृदय में किसी स्नेहिल स्पर्श को समाए मंजरी सदा मुस्कुराती रहती थी। इस तरह जीवन में सत्य और मिथ्या घुलते गए और ईश्वर का बनाया इंसान अपनी ही बनाई दिशा में मुड़ गया।

अब शुद्ध सत्य केवल वही था, जो कवि गाता था। अर्थात साक्षात् प्रेम कृष्ण और चिर-प्रिया राधा के गीत। अर्थात लोक के अलौकिक भाव। अर्थात कालातीत दुःख और असीमित आनंद… उसके इन गीतों में सत्य का आस्वाद था, जो राजा से भिखारी तक प्रत्येक व्यक्ति को छूता था। धीरे-धीरे उसके गीत हर एक होंठ पर बस गए। शेखर गाता रहा। राजा सुनता रहा। दरबारी वाह-वाह करते रहे। नदी पर आते-जाते मंजरी कवि के घर रुकती रही। परदे के पीछे से एक परछाई अपने स्वर्ण नूपुरों का संगीत हवा में बिखेरती रही और चांद का मद्धम प्रकाश हो या गर्मियों की बेसुध हवा की फुसफुसाहटें, उसके गीत सीमाओं को तोड़ते हुए खिड़कियों से आंगन तक, तैरती कश्तियों से लेकर पहरेदारों की तरह रास्ता निहारते पेड़ों और बंजर नींदों में तक अनगिनत आवाजों का पैरहन पहन हर ओर बिखरते रहे। ये अच्छे दिन यूं ही गुजर गए।

एक दिन अमरापुर के दरबार में राजा नारायण के यहां दक्षिण से एक कवि आया। वो राजा के सामने खड़ा हो गया और राजा की प्रशंसा में छंद कहे। उसके बारे में कहा जा रहा था कि अपने गृह नगर से अमरापुर की यात्रा में उसने तमाम दरबार के दरबारी कवियों को छंद-युद्ध की चुनौती दी थी और उसकी विजय का क्रम अभी तक अटूट रहा था।

राजा ने सम्मान से उसका स्वागत किया, जिसके प्रत्युत्तर में दक्षिण के कवि पुण्डरीक ने सगर्व अपनी चुनौती प्रस्तुत कर दी। राजा का दरबारी कवि शेखर नहीं जानता था कि शब्द युद्ध कैसे किया जाता है। वह सारी रात सो न सका। रात के अंधेरे में हर क्षण पुण्डरीक की छवि, उसकी ऊँची तीखी नासिका, उसका गर्व से ताना माथा शेखर की आँखों में तैरता रहा।

अगली सुबह शेखर ने कांपते हृदय से दरबार में प्रवेश किया। पूरा परिसर लोगों से खचाखच भरा हुआ था। शेखर ने अपने प्रतिद्वंदी का अभिवादन मुस्कुराकर और सिर झुकाकर किया। पुण्डरीक ने धौले से सिर हिलाकर प्रति-उत्तर दिया और एक अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ अपना चेहरा झटके से सामने रखे फूलों की ओर घुमा लिया। शेखर ने ऊपर झरोखे की ओर देखा और अपने मन में बसी अनदेखी छवि के सामने नतमस्तक होते हुए प्रार्थना की,

“यदि मैं आज की चुनौती जीत जाता हूँ, तो मेरी प्रिय तुम्हारा ही नाम ज्योतित होगा।”

तभी तुरहियां बजने लगीं। राजा की जय-जयकार करती भीड़ एक साथ खड़ी हो गई। सफ़ेद पोशाक में सजे राजा ने पतझर के बादल की तरह दरबार में प्रवेश किया और सिंहासन पर बैठ गया। राजा के आसन ग्रहण करते ही विशाल परिसर एकदम शांत हो गया। पुण्डरीक उठा और ऊँचे स्वर में राजा की प्रशंसा में गीत गाने आरंभ कर दिए, उसके शब्द किनारों से टकराती समंदर की लहरों की तरह दरबार की दीवारों से और श्रोताओं के कानों से टकरा रहे थे। जिस कौशल के साथ उसने नारायण नाम के अनगिनत अर्थ प्रस्तुत किए, उससे श्रोताओं की सांसें ही थमकर रह गईं। एक गर्वयुक्त मुस्कान के साथ जब वह आपने स्थान पर लौटा तब भी ऐसा लगता था कि जैसे दरबार के कोने-कोने में, हज़ारों निशब्द हृदयों में रह-रहकर एक कंपन टकरा रहा है। रह-रहकर एक आघात गूंज रहा है। एक क्षण….जो शायद युग से भी बढ़कर था, दरबार में सन्नाटा पसरा रहा और फिर करतल ध्वनि से दरबार भर गया। दूर-दूर से आए विद्वानों ने एक स्वर में कहा, जय हो!

राजा ने शेखर की और देखा, प्रतिउत्तर में शेखर ने अपनी आंखों में दर्द भरकर उसे सौंप दिया और फिर राजाज्ञा के पालन में शेखर अपने आसन पर कुछ यूं उठा जैसे झाड़ियों में छिपा हिरन… उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। उसके लज्जा से आरक्त मुख पर किसी स्त्री सम-भाव थे। तिस-पर उसकी झुकी-झुकी सी सुकुमार इकहरी काया, ऐसी जान पड़ती थी जैसे वीणा के तार पर ठहरी हुई सी कोई छुअन…

जब उसने गायन आरम्भ किया, उसका सिर झुका हुआ था और आवाज़ बहुत नीची। इसलिए उसके शुरुआती शब्द लगभग अनसुने ही रह गए, लेकिन फिर उसने हल्के से अपना सिर उठाया और आत्मिक आनंद के साथ भावों में उतरना आरंभ किया। धीरे-धीरे शेखर के शब्दों में भाव प्रतिष्ठित होते गए, उसका मीठा स्वर आसमान से ऊँचा प्रतीत होने लगा। उसने अतीत की धुंध में खो गई पौराणिक कहानी से बात आरंभ की और उसे बड़े ही कौशल के साथ समकालीन युग तक ले आया। दरबार में बैठे हर मन को अपने भावों की सरिता में डुबो देने के बाद शेखर ने अपनी दृष्टि राजा के चेहरे पर टिका दी और कहा-

“राजन! संभव है कि मैं शब्दों के खेल में हार जाऊं लेकिन आपके प्रति निष्ठा और प्रेम में कदापि नहीं…”

भावुकता की आंच ने हर आंख को नम कर दिया। पत्थर की दीवार भी जैसे हार-जीत का निर्णय करने को आतुर हो उठीं। भावनाओं का यह सैलाब पुण्डरीक के लिए अप्रत्याशित था और हार मानना उसकी आदत नहीं थी। सिर झटक कर वह फिर खड़ा हुआ और गरजते हुए उसने सभा के बीच प्रश्न रखा-

“शब्द से बड़ा कौन है?”

सभा के लिए प्रश्न अप्रत्याशित था। चारों ओर गहरा मौन बिखर गया। सभा की स्तब्धता से बल पाकर वह बोलता गया, “शब्द सृजन का आरंभ हैं। शब्द ब्रह्म है।”

धर्मग्रंथों, शास्त्रों के तमाम उदाहरण देकर उसने शब्द को उस स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया जो धरती और आकाश से ऊपर था। इतना कहकर उसने पुनः अपना प्रश्न दोहराया और चारों ओर देखा। किसी ने भी उसकी चुनौती का उत्तर देने का साहस नहीं किया। वह उस सिंह की तरह धीमे चाल से चलता हुआ अपने स्थान पर जाकर बैठ गया, जिसने अभी-अभी शिकार को उदरस्थ किया हो।

एक बार पुनः दरबार कह उठा, साधू साधू साधू। राजा आश्चर्य से घिरा मौन बैठा था, जबकि शेखर स्वयं को कुछ कहने योग्य नहीं पा रहा था और इस तरह शर्म का बोझ लेकर दिन समाप्त हो गया।

अगला दिन। हार-जीत का दिन।

शेखर ने गाना आरंभ किया। यह उस समय का गीत था, जब वृंदावन की हवाओं में कान्हा ने पहली बार प्रेम की बांसुरी में प्राण फूंके थे। ग्वालिनें समझ नहीं पा रही थीं कि ये संगीत कहां से आ रहा है? या कौन है इस तान का बजैया? कभी उन्हें लगता यह गीत दक्षिण की बयार लेकर आयी है, तो कभी उन स्वरों में उंची पहाड़ियों से उतरते बादलों का अहसास होता। कई बार उन्हें लगता कि यह गीत सूरज की धरती से विश्वास का सन्देश लेकर आ रहा था। लगता जैसे सितारों ने रात के सपनों में संगीत घोलने वाले अपने स्वर समेटकर इस गीत में भर दिए हैं, जो अपने साथ अंबर की नीलिमा से घास की हरियाली तक सब-कुछ बहा ले जाना चाहता है। बहा ले जाना चाहता है यह लहराते खेत, ख़ाली मैदान, सूने रास्ते और छायादार गलियां… वे न गीत के शब्दों का अर्थ जानती थीं और न ही अपने मन में उठती भावनाओं को प्रकट करने के लिए उनके पास शब्द थे। लेकिन उनकी आंखों में आंसुओं का समंदर था और उनका जीवन एक क्षण में मृत्यु जितना लम्बा हो गया था।

गाते-गाते शेखर खुद को भूल गया। भूल गया अपने शत्रु की कटाक्ष भरी मुस्कान और उसकी आवाज़ का कम्पन। उस क्षण विचारों के झंझावातों के बीच वह अकेला था। ठीक वैसे ही जैसे कालिंदी के किनारों पर ठहरी गर्म हवा में शामिल सूखी पत्तियों की चरमराहट और बांसुरी के स्वर.. लेकिन परदे के पीछे से किसी सिरहन की तरह गुज़रती परछाई और शनै-शनै दूर होते स्वर्ण नूपुरों के संगीत का विचार तब भी मन के किसी कोने में करवट बदल रहा था।

बहुत देर तक वो गाता रहा। फिर गहरे मौन के बीच वह वापस अपने आसन पर बैठ गया। प्रेम, उदासी और आनंद के मिले-जुले भावों से आकंठ भरे श्रोता प्रशंसा करना भूल गए। साधू कहना भूल गए। तालियां बजाना भूल गए। पुण्डरीक को दूसरी चोट लगी। फुफकारते हुए वह उठा ओर सीधे शेखर से पूछने लगा-

“प्रेम को समझाने से पूर्व प्रिया-प्रियतम के विषय में बताओ? बताओ कि कौन हैं राधा-कृष्ण?”

फिर उसने स्वयं ही उन नामों की व्याख्या आरम्भ कर दी। धर्म, दर्शन, लोक, परलोक… निमिष मात्र में समस्त ज्ञान उसकी वाणी में उतर आया। राधा-कृष्ण नाम को तर्क और अर्थ की कसौटी के साथ कभी जटिल कभी सरल न जाने कितनी तरह से उसने आपस में गुंथा और उधेड़ा। उसकी व्याख्याओं से विद्वजन चकित थे। वे एक स्वर में सब बोल उठे- साधू साधू साधू! लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। यद्यपि वे स्वयं को एक छलना का शिकार महसूस कर रहे थे। उस दिन वो एक सत्य के साक्षी बने, लेकिन अंत में एक बौद्धिक आडंबर ने उनकी आंखों के सामने उस सरल सत्य को धज्जी-धज्जी कर दिया।

राजा का मन आश्चर्य अतिरेक से भरा हुआ था। वातावरण संगीत से पूरी तरह भर चुका था। यत्र-तत्र-सर्वत्र शब्द ही शब्द बिखरे प्रतीत होते थे। पुण्डरीक, दैत्यकार कवि के सामने लोगों की दृष्टि में उनका अपना कवि बहुत छोटा हो गया था। पहली बार उन्हें लग रहा था कि शेखर के गीत कितने साधारण थे। उनमें न नव्यता थी, न ज्ञान, न कोई तथ्य और न ही कथ्य। बल्कि वे स्वयं ऐसे गीत लिख सकते थे और अगर अब तक नहीं लिख पाए थे, तो इसके पीछे कोई ओर कारण भले हो, लेकिन योग्यता बिल्कुल भी नहीं थी।

राजा ने अपने दरबारी कवि को उत्साहित करने का प्रयास किया, लेकिन शेखर ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने आसन पर सिर झुकाए बैठा रहा, मानो वहां होकर भी न हो। गुस्से में राजा सिंहासन से नीचे उतरा। अपने गले से मोतियों की माला उतारी और पुण्डरीक को पहना दी। दरबार में सब प्रसन्न थे।

दरबार के ऊपरी हिस्से से परदे के पीछे छिपी करधनियों में जड़े स्वर्ण घुंघुरुओं के खनकने, लहगों और ओढ़नियों के सरसराने के बीच वही चिर-परिचित स्वर्ण नुपुर छनकने की आवाज़ आई। शेखर उठ खड़ा हुआ और दरबार से बाहर निकल गया।

वो घटते चांद की अंधेरी रात थी। शेखर अपनी पांडुलिपियों के साथ जमीन में बैठ गया। इनमें से बहुत सी रचनाएं इतनी पुरानी थीं कि वह उनके बारे में भूल ही चुका था। आत्म-विस्मरण की सी स्थिति में, वह एक-एक करके रचनाएं पलटता, आगे-पीछे से कोई भी पंक्ति पढ़ता और खीझकर उन्हें सामने से हटा देता। आज उसे अपना पूरा रचनाकर्म महत्वहीन और अर्थहीन लग रहा था। मानो… मानो किसी अबोध शिशु के अनगढ़ शब्द…

एक-एक करके वो अपनी रचनाओं को फाड़ता रहा। उन्हें जलता रहा और कहता रहा-

“ओह मेरी प्रियतमा, मेरी उर्जा, मेरी सौंदर्या तुम्हारे लिए…! तुम इतने समय से मेरे भीतर दीपशिखा सी जलती रही। यदि मेरा हृदय सोना होता तो निश्चित ही निखर जाता लेकिन ये तो सूखी घास जैसा निकला। कुछ नहीं बचा सिवाय गर्म राख के…..व्यर्थ व्यर्थ व्यर्थ…”

रात चढ़ आयी थी। शेखर ने सारी खिड़कियां खोल दीं। उसने अपनी शैया पर सफ़ेद फूल बिखेर लिए, जो उसे बहुत पसंद थे। उसने अपने घर के तमाम दीप जला दिए, शहद में किसी जहरीली जड़ का रस मिलाकर पी लिया और अपने बिस्तर पर लेट गया। हौले-हौले जहर उसकी नसों में घुल रहा था। तभी दरवाज़े पर स्वर्ण नुपुर बजे और धीरे-धीरे एक भीनी सी सुगंध ने भीतर प्रवेश किया। गहन तंद्रा की स्थिति में शेखर ने कहा,
“ओह मेरी प्रिया…. क्या तुम्हें अंततः अपने सेवक पर दया आ गई और तुम अंतिम बार उससे मिलने चली आईं?”

मधुर स्वर ने उत्तर दिया, “मेरे कवि मैं आ गई…”

अधमुंदी आंखों से शेखर ने देखा- एक अस्पष्ट सी छाया उसके बहुत समीप थी। शेखर को लगा यह छाया उसकी ही है, जो सदा उसके मन में रहती थी। आज वह उन पर्दों से निकलकर सामने आयी है, संभवतः अंतिम मिलन के लिए!

शेखर ने लुप्त होती चेतना के साथ सुना, राजकुमारी उसके कान में कह रही थी, “मैं अजीता हूँ कवि…. राजा ने न्याय नहीं किया, किन्तु मेरे कवि वो तुम थे, जिसने आज की चुनौती जीती और देखो, मैं तुम्हें तुम्हारी विजय का पुरस्कार देने आयी हूँ…”

इतना कहते ही उसने अपने गले से फूलों की माला उतारी और शेखर के सिर पर (किसी मुकुट की तरह) रख दी।

उसी क्षण मृत्यु के आघात ने कवि को उसकी शैया से गिरा दिया, लेकिन स्वीकृति की तृप्ति उसकी आँखों में अब भी महक रही थी।