अमीर खुसरो की पहेलियाँ – 1

श्याम वरन और दाँत अनेक,
लचकत जैसे नारी,
दोनों हाथ से ‘खुसरो’ खींचे
और कहे तू आरी।

– आरी

इधर को आवे उधर को जावे,
हर-हर फेर काट वह खावें।
ठहर रहे जिस दम वह नारी,
खुसरो कहे बरे को आरी।

– आरी

एक नार वह दाँत दंतीली
पतली दुबली छैल छबीली।
जब वा तिरियाहिं लागे भूख
सूखे हरे चबावे रूख।
जो बताय वाही बलिहारी,
खुसरो कहे बरे को आरी।

– आरी

बाला था जब सब को भाया,
बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया आसका नाँव
अर्थ करो नहीं छोड़ों गाँव!

– दिया

सावन भादों बहुत चलत हैं, माघ पूस में थोरी,
अमीर खुसरो यों कहे तू बूझ पहेली मोरी।

– मोरी (नाली)

चार महीने बहुत चलत है, और महीने थोरी
अमीर खुसरो यो कहे तू बूझ पहेली मोरी।

– मोरी (नाली)

अंदर है और बाहर बहे
जो देखे सो मोरी कहे।

– मोरी (नाली)

फारसी बोली आईना,
तुर्की ढूंढी पाई ना।
हिंदी बोली आरसी आए,
खुसरो कहे कोई न बताए।

– आरसी (दर्पण)

आरसी – शीशा, आर+सी (आर = लज्जा, सी = जैसी)

पौन चलत वह देह बढ़ावै,
जल पीवत वह जीव गंवावै।
है यह प्यार सुन्दर नार
नार नहीं, पर है वह नार!

– नार (आग)

नार – स्त्री (हिन्दी), आग (अरबी)

एक नार करतार बनाई,
ना वह क्वाँरी ना वह ब्याही।
सूहा रंग ही वाको रहे
भावी, भाबी हर कोई कहे।

– भावी (वीर बहूटी)

सूहा – लाल
भावी – भाभी, वीर बहूटी

एक पेड़ रेती में होवे
बिन पानी ही हरा रहे।
पानी दिए से वह जल जाय
आंक लगे अन्धा हो जाए।

– आक

आंक – आँख, आक (आक का एक छोटा पौधा होता है, कहा जाता है कि आक के दूध को आँखों में डालने से आदमी अँधा हो जाता है)

एक बार जब बन कर आवे
मालिक अपने ऊपर बुलावे।
है वह नारी सब के गौं की
खुसरो नाम लिए तो चौकी

– चौकी

गौं – मतलब, काम निकालने का मौका
चौकी – चौकन्ना

नारी से तू नर भई और श्याम वरन भई सोय
गली-गली कूकत फिरे कोइलो, कोइलो लोय।

– कोयल

लकड़ी को नारी और कोयले को नर कहा गया है
कोइलो – कोई ले लो, कोयला
लोय -लोक, लोग

एक मंदिर के सहसर दर
हर दर में तिरिया का घर
बीच-बीच बाके अमरत ताल
बूझ है इनकी बड़ी महाल

– महाल (शहद का छत्ता)

महाल – कठिन, शहद का छत्ता

एक नार तरूवर से उतरी माँ सो जनम न पायो।
बाप का नाम जो वासे पूछयो, आधा नाम बतायो।
आधा नाम बतायों खुसरो कौन देस की बोली।
वाका नाम जो पूछा मैंने, अपना नाँव न बोली!

– निबोली

न बोली – न बोली, निबोली

जल जल चलता बसता गाँव,
बस्ती में नावा का ढाँव!
खुसरो ने दिया वाका नाँव,
बूझो अर्थ नहीं छोड़ो गाँव ।

– नाव

नर नारी की जोड़ी डीठी
जब बोले तब लागें मीठी।
इक-न्हाय इक तापन हारा।
कर खुसरो कप कूच नकारा।

– नक्कारा

घूम-घुमेला लहँगा पहिने, एक पाँव से रही खड़ी।
आइ हाथ है, उस नारी के सूरत उसकी लगे परी।
सब कोई उसकी चहा करे हैं, मुसलमान, हिन्दू, छत्री।
खुसरो ने यह कही पहेली, दिल में अपने सोच ज़री।

– छतरी

ज़री – ज़रा

पान फूल वाके सर माँ हैं।
लड़े-कटें जब मद पर आहैं।
चिट्टे काले वाके बाल।
बूझ पहेली मेरे लाल।

– लाल चिड़िया

लाल – लाल एक चिड़िया, बेटा

एक नार चरन वाके चार।
स्याम बरन, सूरत बदकार।
बूझो तो मुश्क है न बूझो तो गुँवार।

– मुश्क (कस्तूरी)

हाड़ की देही उज्जवल रंग।
लिपटा रहे नारि के संग।
चोरी की, ना खून किया।
वाका सिर क्यों काट लिया।

– नाखून

बीसों का सिर काट लिया।
ना मारा ना खून किया।

– नाखून