नई दिल्ली बुक फेयर जारी है। लोग पूरा-पूरा दिन घूमकर किताबें देख रहे हैं, खरीद रहे हैं और दोस्तों को बता भी रहे हैं। जिनके पास समय की कमी है, वे सुझाव भी माँग रहे हैं। प्रत्येक वर्ग, रूचि, पसन्द और बजट की भी किताबें उपलब्ध हैं। जिस भाषा के साहित्य में रूचि हो, उस भाषा की किताबें खरीदी जा सकती हैं। लेकिन परिपक्व पाठकों की बातों के बीच एक महत्वपूर्ण वर्ग है बच्चों का, जो अपने लिए नयी किताबों और पढ़ने की सामग्री का बड़े लोगों से भी ज़्यादा उत्साह और गम्भीरता से इंतज़ार करता है।

बाल-साहित्य की अच्छी किताबें लेकर आना न केवल महत्वपूर्ण, बल्कि एक कठिन काम है। बच्चों का मूड ऐसे है जैसे आजकल दिल्ली का मौसम। कभी चाव की धूप तो कभी सब-कुछ ठप करती बारिश, कभी हंसी-खेल की गर्मी तो कभी ठंडी प्रतिक्रियाएँ।

ऐसे में दिल्ली के मौसम को बदलने दूर देश भोपाल से ‘प्लूटो’ आया है, चलिए एक मुलाक़ात कर लेते हैं..

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“प्लूटो किताबों की दुनिया का सबसे छोटा ग्रह है। सबसे छोटे बच्चों के लिए।”

‘प्लूटो’ 8 साल तक के बच्चों के लिए, भोपाल की संस्था ‘इकतारा’ द्वारा निकाली गयी एक द्विमासिक पत्रिका है। इस पत्रिका में कविताएँ, कहानियाँ और साहित्य की तमाम विधाओं को एक अनूठे रूप में पेश किया जाता रहा है। बच्चों को केवल शब्द परोस दिए जाएँ तो वे सम्भवतः थाली की तरफ देखें भी नहीं, लेकिन ‘प्लूटो’ का हर एक कौर बच्चे बड़े चाव से खाते हैं। चित्रों और मज़ेदार किस्सों के ज़रिये, पढ़ने के साथ-साथ सुनने और अनुभव करने की महत्ता को जोड़कर, बच्चों के विषयों का विस्तार करना भी प्लूटो की एक ख़ासियत है। बच्चों के एक उम्र पर पहुंचने पर ही उनका कुछ विषयों से परिचय कराना जहाँ सही है, वहीं उन विषयों की सामग्री को उनके उम्र के मुताबिक़ ढालना भी बाल-साहित्यकारों के कार्यक्षेत्र में आता है, और यह काम ‘प्लूटो’ बखूबी करती नज़र आती है..

इस बार नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में हॉल न. 12A में स्टॉल-108 और हॉल न. 7 में स्टॉल-165 पर प्लूटो मौजूद है। उसकी एक झलक देख ली जाए:

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बचपन में कॉमिक्स बच्चों को खूब लुभाती हैं। चाहे चम्पक हों या चाचा चौधरी, हम सभी के बचपन का एक अहम हिस्सा रही हैं कॉमिक्स। कॉमिक्स की तर्ज पर नहीं, लेकिन उसी तरह के आवरण और आस्वाद के साथ प्लूटो केवल किस्से सुनाने ही तक सीमित न होकर, ज़िन्दगी से जुड़ी बातें खेल-खेल में ही बच्चों को सिखाने का उद्देश्य साथ लेकर आयी है।

प्लूटो और अन्य किताबों के साथ-साथ पोस्टर्स एंड पोएट्री कार्ड्स भी ख़ास बच्चों के मूड और पसन्द को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।

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अगर बचे हुए दिनों में आपका रुख प्रगति मैदान की तरफ हो, तो बाल-साहित्य के इस नए और लुभावने कोने से होकर गुज़रना न भूलें और साथ ही अपने घर के बच्चों को कला के क्षेत्र के इस मासूम से ग्रह की सैर करा आएँ तो सोने पर सुहागा। बच्चे अक्सर अपनी चीज़ खुद ही चुनते हैं। प्लूटो चुने जाने के इंतज़ार में है, बच्चों की प्लूटो से मुलाकात आपको करानी है..

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जहाँ प्लूटो 8 साल तक के बच्चों के लिए हैं, वहीं इकतारा 9-12 वर्ष के बच्चों के लिए अपनी नयी मैगज़ीन ‘साइकिल’ लेकर आ रही है।

‘प्लूटो’ और ‘साइकिल’ के सब्सक्रिप्शन से लेकर इकतारा की सारी इवेंट्स की जानकारी इकतारा की वेबसाइट पर भी देखी जा सकती है।


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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