कविताएँ अपने पाठकों के भीतर बहुत कुछ जगा देती हैं और उन्हें बहुत जगह भी देती हैं जिसमें कुछ न कुछ चुपचाप बैठा रहता है, जीता रहता है, बढ़ता रहता है और मौका ढूँढता रहता है उस क्षण का जब वह जीती-बढ़ती चीज़ अपने स्वरूप को पाकर अभिव्यक्ति पा सके। अधिकतर यह अभिव्यक्ति भी कोई वक्तव्य न होकर असमंजस में घिरा एक आलाप ही होता है जिसे केवल सुन लेना होता है उसी क्षण। आदर्श भूषण का यही आलाप ‘दुविधा’ के रूप में सामने आया है मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम कदम पर’ पढ़कर। यह कविता यहाँ पढ़ी जा सकती है-

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बांहें फैलाए!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने….
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य पीडा है,
पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी!
बेवकूफ बनने की खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह देख-देख बडा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ…
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है
हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत…. स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियां लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहां जरा खडे होकर
बातें कुछ करता हूँ
…. उपन्यास मिल जाते ।

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दुविधा

लेखनी का एक अदना-सा सेवक होने के दायित्व से जब कभी कलम के साथ ताल मेल बनाकर इत्मीनान से कुछ लिखने बैठता हूँ तो अक्सर दुविधा में पड़ जाता हूँ कि लिखूँ तो लिखूँ क्या? अश्वमेध यज्ञ के अश्व के सामान निरंतर दौड़ता मन संभ्रमित होता है विषयों के चयन में ! दुविधा अक्सर यह होती है कि विषयों का वृत्त क्या हो? विषय वृत्त की परिमिति तक विवरण के लिए सीमित हों या उस वृत्ताकार संरचना से बाहर होकर विषयों का निष्कर्ष निर्धारित किया जाये। जब भी कभी इन विषयरूपी चौराहों पर खड़ा होता हूँ, दुविधापूर्ण स्थिति होती है, कहानियां लेकर और कुछ देकर ये चौराहे फैलते जाते हैं जहाँ खड़े होकर कुछ बात करता हूँ तो उपन्यास मिल जाते हैं, मिलती है दुःख की कराहती कथाएं, तरह तरह की पीड़ापूर्ण शिकायतें, अहंकार- विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान, राजनैतिक परिचर्चाएं और ज़माने की जानदार सूरें व आयतें सुनने को मिलती हैं।

दुविधा यह नहीं है कि कमी है विषयों की वरन यह कि उनका आधिक्य मुझे सताता है और मैं उचित चुनाव करने में खुद को अक्षम प्रतीत होता हूँ।

वस्तुतः दुविधा का विवरण केवल लेखन का ही नहीं है अपितु जीवन की परिभाषा का अन्वेषण करते सभी तथ्यों का है। यह दुविधा निवारणहीन कोशिकीय अंश की तरह सूर्योदय से सूर्यास्त तक, आदि से अंत तक, राजा से रंक तक, आम जनसमूह से आबालवृद्ध तक, इतिहास से समसामयिकता तक एवं पाताल से आकाश तक निरंतर परिभाषित होती रहती है।

उदाहरणार्थ, एक सामान्य व्यक्ति की दुविधा। यदि दिन रात श्रम करे तो अर्थलोलुपता या अति अर्थोपार्जन का शिकार, श्रम ना करे तो आलस्य का। धन का अधिक व्यय करे तो फिजूलखर्च या दिखावा, व्यय ना करे तो कंजूस। धनाढ़ व्यक्ति हो तो कथित रूप से कालाधन का भण्डार एवं धन का आभावी हो तो मूर्ख कहलाता है कि बुद्धि होती तो ये समय ना आता। और  जीवन भर परिश्रम कर धन एकत्रित किया हो तो बेवकूफ कि धन का सुख ही नहीं भोगा तो कमाया क्यों था?

तभी मेरी लेखनी असमंजस में होती है कि लिखूँ तो क्या लिखूँ? एक आम आदमी की प्रतिदिन की दुविधा लिखूँ कि उसका भविष्य कैसा हो या एक नन्हे से बालक के टूटे खिलौने के पुनर्निर्माण की दुविधा लिखूँ। एक विद्यार्थी के परिक्षिक क्षण की दुविधा लिखूँ या परीक्षक की उत्तर पत्रक के परिक्षण की दुविधा लिखूँ। रोग से जूझते रोगी की पीड़ापूर्ण दुविधा लिखूँ या चिकित्सक की चिकित्सकीय पराकाष्ठा की दुविधा लिखूँ। अदालती कार्रवाई में सत्य और असत्य के बीच उलझे न्यायाधीश की दुविधा लिखूँ या न्याय के पाक्षिक तथ्य दर्शन की दुविधा लिखूँ। आम जनजीवन में व्यस्त इंसान की दुविधा लिखूँ या चौराहे पर चाय की दुकान में बैठे, चुटकुलों और कहकहों का आनंद उठाते जनसमूह की तार्किक दुविधा लिखूँ। पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीराम की अतुलनीय दुविधा लिखूँ या प्रतापी रावण की दुविधा लिखूँ ? (जहाँ राम रावण को दसवें सिर की अमंगल सोच का ज्ञान ना करवा पाये और रावण अपने श्राप की दुविधा से बाहर ना आ पाया) महाभारत की द्यूतक्रीड़ा में फंसे युधिष्ठिर की दुविधा लिखूँ या वहां उपस्थित सभासदो की दुविधा लिखूँ। कुंती के कौमार्य क्षण में जन्मे पुत्र की दुविधा लिखूँ या देवव्रत के ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा की दुविधा लिखूँ।

सत्य तो यह है कि दुविधाएं जीवन का स्वरुप है जो ज्ञात कराती है उचित मार्ग की अश्रुपूर्ण प्रवृति का, मानव की वास्तविक सुस्मित स्वायत्तता का और स्वाभाविक मानसिकता का। दुविधा का विवरण करते करते जब मैं थक सा जाता हूँ तो घबराये प्रतीक और मुस्कुराते रूप चित्र मेरा स्वागत उपमाओं के साथ करते है और उपमाएं कहती है निरंतर लिखना भी तुम्हारी लेखन प्रक्रिया का एक दुविधापूर्ण हिस्सा ही है..।

 

चित्र श्रेय: Mike Enerio