‘एक प्रेम कहानी’ – सआदत हसन मंटो

मुझसे सम्बंधित आम लोगों को यह शिकायत है कि मैं प्रेम कहानी नहीं लिखता। मेरे अफ़सानों में चूंकि इश्क़ो-मुहब्बत की चाशनी नहीं होती इसलिए वो बिलकुल सपाट होते हैं। मैं अब यह प्रेम कहानी लिख रहा हूँ ताकि लोगों की यह शिकायत किसी हद तक दूर हो जाए।

जमील का नाम अगर आपने पहले नहीं सुना तो अब सुन लीजिए। उसका परिचय मुख़्तसर तौर पर कराए देता हूँ। वो मेरा लंगोटिया दोस्त था, हम इकट्ठे स्कूल में पढ़े, फिर कालेज में एक साथ दाखिल हुए। मैं एम. ए. में फेल हो गया और वो पास। मैंने पढ़ाई छोड़ दी मगर उसने जारी रखी। डबल एम. ए. किया और पता नहीं कहाँ गायब हो गया। सिर्फ इतना सुनने में आया था कि उसने एक पांच बच्चों वाली माँ से शादी कर ली थी और बाहर चला गया था। वहां से वापस आया या कहाँ रहा, इस सम्बन्ध में मुझे कुछ मालूम नहीं।

जमील बड़ा आशिक़ मिज़ाज था। स्कूल के दिनों ही में उसका मन बेक़रार रहता था कि वो किसी लड़की की मुहब्बत में गिरफ्तार हो जाए। मुझे ऐसी गिरफ्तारी से कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन उसकी सरगर्मियों में जो इश्क से जुड़ी होतीं, बराबर हिस्सा लिया करता था।

जमील लम्बे कद का नहीं था मगर अच्छे ख़दो-ख़ाल का मालिक था। मेरा मतलब है उसे खूबसूरत न कहा जाए तो उसके क़बूल सूरत होने में शको-शुबह नहीं था। रंग गोरा और सुर्खी माइल, तेज़-तेज़ बातें करने वाला, बला का ज़हीन, मनोविज्ञान का छात्र, बड़ा सेहतमंद।

उसके दिलो-दिमाग़ में जवानी तक पहुँचने से कुछ अर्सा पहले ही प्रेम करने की ज़बरदस्त ख़्वाहिश पैदा हो गयी थी। उसको ग़ालिब के इस ‘शेर’ का अर्थ अच्छी तरह मालूम था-

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे

मगर इसके विपरीत वो ये आग खुद अपनी माचिस से लगाना चाहता था।

उसने इस कोशिश में कई माचिस जलाई। मेरा मतलब यह है कि कई लड़कियों के इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाने के लिए नए-नए सूट सिलवाए, बढ़िया से बढ़िया टाइयां खरीदीं, सेंट की सैंकड़ों शीशियाँ इस्तेमाल कीं मगर यह सूट, टाइयां और सेंट उसकी कोई मदद न कर सके।

मैं और वो, दोनों शाम को कम्पनी बाग़ का रुख करते। वो ख़ूब सजा बना होता। उसके कपड़ों से बेहतरीन खुशबू निकल रही होती। बाग़ की रविशों पर कई लड़कियाँ बदसूरत, ख़ूबसूरत, क़बूल सूरत ‘महवे ख़िराम’ होती थीं। वो उनमें से किसी एक को अपने इश्क़ के लिए चुनाव करने की कोशिश करता मगर नाकाम रहता।

एक दिन उसने मुझसे कहा: ‘सआदत मैंने आख़िरकार एक लड़की चुन ही ली है। ख़ुदा की कसम, चन्दे आफ़्ताब, चन्दे माहताब है। मैं कल सुबह सैर के लिए निकला। बहुत सी लड़कियाँ भाई के साथ स्कूल जा रही थीं। उनमें एक बुर्क़ापोश लड़की ने जो अपनी नक़ाब हटाई तो उसका चेहरा देख कर मेरी आँखें उस पर टिकी रह गयीं। क्या हुस्नो-जमाल था। बस मैंने वहीं फैसला कर लिया कि जमील अब ज्यादा न भागो, उस हसीना के इश्क में तुम्हें गिरफ्तार होना चाहिए। होना क्या तुम हो चुके हो।’

उसने फैसला कर लिया कि वो रोज़ सुबह उठ कर उस मुक़ाम पर जहां उसने काफिर-जमाल हसीना को देखा था, पहुँच जाया करेगा और उसको अपनी तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश करेगा।

इसके लिए उसके ज़हीन दिमाग ने बहुत से प्लान सोचे थे। एक जो दूसरे के मुक़ाबले में ज्यादा प्रभावशाली था, उसने मुझे बता दिया था।

उसने हिसाब लगाकर सोचा था कि दस दिन लगातार उस लड़की को एक ही मुक़ाम पर खड़े रहकर देखने और घूरने से इतना मालूम हो जाएगा कि इसका मतलब क्या है? यानि वो क्या चाहता है। इस मुद्दत के बाद वो इसकी प्रतिक्रिया देखेगा और विचार करने के बाद कोई फैसला लेगा।

यह डर था कि वो लड़की देखना या घूरना पसंद न करे। भाई से या अपने पेरेंट्स से उसके इस रवैये की शिकायत कर दे। यह भी मुमकिन था कि वो राज़ी हो जाती। उसकी साबित क़दमी उस पर इतना असर करती कि उसके साथ भाग जाने को तैयार हो जाती।

जमील ने तमाम पहलुओं पर अच्छी तरह विचार कर लिया था। शायद ज़रुरत से ज्यादा। इसलिए कि दूसरे रोज़ जब वो अलार्म बजने पर उठा तो उसने उस मुक़ाम पर जहाँ उस लड़की से उसकी पहली बार मुठभेड़ हुई थी, जाने का ख़याल तर्क कर दिया।

उसने मुझसे कहा: “सआदत मैंने सोचा कि हो सकता है स्कूल में छुट्टी हो क्योंकि जुमा है। मालूम नहीं इस्लामी स्कूल में पढ़ती है या किसी गवर्नमेंट स्कूल में। फिर यह भी मुमकिन था कि अगर मैं उसे ज्यादा शिद्दत से घूरता तो वो भिन्ना जाती। इसके अलावा इस बात की क्या ज़मानत थी कि दस दिन के अन्दर-अन्दर मुझे उसकी प्रतिक्रिया अच्छी तरह से मालूम हो जाएगी। शायद वो रज़ामंद हो जाती, मेरा मतलब है मुझे आसानी से गुफ्तगू का मौका दे देती, तो मैं उससे क्या कहता।”

मैंने कहा: “यही कि तुम उससे मुहब्बत करते हो।”

जमील संजीदा हो गया। “यार, मुझ से कभी कहा न जाता- तुम सोचो न अगर यह सुनकर वो मेरे मुंह पर यह पत्थर दे मारती कि जनाब आपको इसका क्या हक हासिल है, तो मैं क्या जवाब देता। ज्यादा से ज्यादा मैं यह कह सकता कि हुज़ूर मुहब्बत करने का हक़ हर इंसान को हासिल है। मगर वो एक और पत्थर मुझे मार सकती थी कि तुम बकवास करते हो, कौन कहता है कि तुम इंसान हो।”

किस्सा मुख़्तसर यह कि जमील उस हसीनो-जमील लड़की की मुहब्बत में खुद को अपने स्वाभिमान के कारण गिरफ्तार न करा सका। मगर उसकी ख्वाहिश बदस्तूर मौजूद थी। एक और सुन्दर चेहरे वाली लड़की उसकी मुंतज़र निगाहों के सामने आई और उसने फ़ौरन तहैय्या कर लिया कि उस से इश्क लड़ाना शुरू कर देगा।

जमील ने सोचा कि उस से खतो-किताबत की जाए, इसलिए उसने पहले ख़त के कई टुकड़े फाड़ने के बाद एक आखरी, इश्को-मुहब्बत में शराबोर, तहरीर मुकम्मल की, जो मैं यहाँ नक़ल करता हूँ।

जाने-जमील!

अपने दिल की धड़कनें सलाम के तौर पर पेश करता हूँ। हैरान न हो जाएइगा कि यह कौन है जो आपसे यों बेधड़क हमकलाम है। मैं अर्ज़ किए देता हूँ। कल शाम को सवा छः बजे- नहीं, छः बजकर ग्यारह मिनट पर जब आप अमृत सिनेमा के पास तांगे में से उतरीं तो मैंने आपको देखा। बस एक ही नज़र में मुझपर जादू कर दिया।

आप अपनी सहेलियों के साथ पिक्चर देखने चली गयीं और मैं बाहर खड़ा आपको अपनी कल्पना की आँखों से मुख़्तलिफ़ रूप में देखता रहा। दो घंटे के बाद आप बाहर निकलीं। फिर ज़ियारत नसीब हुई और मैं हमेशा-हमेशा के लिए आपका ग़ुलाम हो गया।

मेरी समझ में नहीं आता मैं आपको क्या लिखूं। बस इतना पूछना चाहता हूँ, क्या आप मेरी मुहब्बत को अपने हुस्नो-जमाल की शायाने-शान समझेंगी या नहीं।

अगर आपने ठुकरा दिया तो मैं खुदकुशी नहीं करूंगा, जिंदा रहूँगा ताकि आपके दीदार होते रहें।

आपके हुस्नो-जमाल का परिस्तार

जमील

यह ख़त उसने मेरे घर में एक ख़ुशबूदार काग़ज़ पर अपनी रफ़ तहरीर में मुंतक़िल किया था। लिफाफा फूलदार और खुशबूदार था जिसको जमालियाती ज़ौक़ ने पसंद नहीं किया था।

चंद रोज़ के बाद जमील मुझसे मिला तो मालूम हुआ कि उसने यह ख़त उस लड़की तक नहीं पहुँचाया।

पहली बात यह है कि इश्क का आग़ाज़ ख़त से करना अनुचित है। दूसरी इसलिए कि इस ख़त की तहरीर ठीक नहीं है। उसने खुद को लड़की तसव्वर करके यह ख़त पढ़ा और उसको बहुत मज़हकाख़ीज़ मालूम हुआ। तीसरी इसलिए कि तफ्तीश करने के बाद उसको मालूम हुआ कि लड़की हिन्दू है।

यह मामला भी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया।

उसके घर में मेरा आना जाना था। मुझसे कोई पर्दा वगैरह नहीं था। हम घंटों बैठे पढ़ाई या गपबाज़ियों में मशगूल रहते। उसकी दो बहनें थीं, छोटी-छोटी। उनसे बड़ी बचकाना किस्म की पुर लुत्फ़ बातें होतीं। उसकी मौसी की एक आखिरी दर्जे की सीधी साधी लड़की अज़रा थी। उम्र यही कोई सतरह-अठारह बरस होगी। उसका हम दोनों मज़ाक उड़ाया करते थे।

जमील की जब दूसरी कोशिश भी नाकाम साबित हुई तो वो दो महीने तक खामोश रहा। इस दौरान उसने इश्क में गिरफ्तार होने की कई नई कोशिश की। लेकिन उसके बाद उसको एकदम दौरा पड़ा और उसने एक हफ्ते के अन्दर-अन्दर पांच-छः लड़कियों को अपनी इश्क की बन्दूक के लिए निशाने के तौर पर चुन लिया। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। सिर्फ चार लड़कियों के सम्बन्ध में, मुझे उसकी इश्क़िया मुहिम के बारे में इल्म है।

पहली ने जो उसकी दूर-दराज़ की रिश्तेदार थी, अपनी माँ के ज़रिये उसकी माँ तक अल्टिमेटम भिजवा दिया कि अगर जमील ने उसको फिर बुरी नज़रों से देखा तो उसके हक़ में अच्छा नहीं होगा।

दूसरी ग़ौर से देखने पर चेचक के दागों वाली निकली।

तीसरी की छठे-सातवें रोज़ एक कसाई से मंगनी हो गई।

चौथी को उसने एक लम्बा इश्क़िया ख़त लिखा जो उसकी मौसी की बेटी अज़रा के हाथ आ गया। मालूम नहीं किस तरह। पहले जमील उसका मज़ाक उड़ाया करता था, अब उसने उड़ाना शुरू कर दिया। इतना कि जमील के नाक में दम आ गया।

जमील ने मुझे बताया: “सआदत यह अज़रा जिसे हम बेवकूफी की हद तक सीधी-साधी समझते हैं, सख्त ज़ालिम है। सब समझती है। जिस लड़की को मैंने ख़त लिखा था और गलती से अपनी मेज़ के दराज़ में रखकर यह सोचने में मशगूल था कि वो इसका क्या जवाब लिखेगी, यह कमबख्त जाने कैसे ले उड़ी। अब उसने मेरा ‘नातक़ा’ बंद कर दिया है। कभी-कभी ऐसी तल्ख़ बातें करती है कि मुझे रुलाती है और ख़ुद भी रोती है। मैं तो तंग आ गया हूँ।

उससे बहुत ज्यादा तंग आकर उसने अपने इश्क की मुहिम और तेज़ कर दी। अबकी उसने चौदह लड़कियां चुनीं मगर अच्छी तरह ग़ौर करने के बाद उनमें से सिर्फ एक बाक़ी रह गयी। दस उसके मकान से बहुत दूर रहती थीं जिनको हर रोज़ देखने के लिए उसका दिल गवाही नहीं देता था। दो ऐसी थीं जिनके खानदानी होने के बारे में उसे शुबहा था। बारह हुईं। तेरहवीं ने एक दिन ऐसी बुरी तरह घूरा कि उसके होश ठिकाने लग गए।

चौदहवीं जो चौदहवीं का चाँद थी, पट जाती मगर वो कमबख्त कम्युनिस्ट थी। जमील ने सोचा था कि उसका प्रेम पाने के लिए वो ज़रूर कम्युनिस्ट बन जाता। खादी के कपड़े पहनकर मज़दूरों के हक़ में दस बारह तक़रीरें भी कर देता। मगर मुसीबत यह थी कि उसके वालिद साहब रिटायर्ड इंजिनियर थे, उनकी पेंशन यकीनन बंद हो जाती। यहाँ से नाउमीदी हुई तो उसने सोचा कि इश्कबाज़ी फ़जूल है। शराफत यही है कि वो किसी से शादी कर ले। उसके बाद अगर तबियत चाहे तो अपनी बीवी की मुहब्बत में गिरफ्तार हो जाए। चुनांचे उसने मुझे इस फैसले से आगाह किया। तय यह हुआ कि वो अपनी अम्मा जान और अपने अब्बा जान से बात करे।

बहुत दिनों की सोच विचार के बाद उसने इस गुफ़्तगू का ख़ाका तैयार किया। सबसे पहले उसने अपनी अम्मी से बात की। वो खुश हुईं। इधर-उधर अपने अज़ीज़ों में उन्होंने जमील के लिए मौज़ूं रिश्ता ढूँढने की कोशिश की मगर नाकामी हुई। पड़ोस में खान बहादुर की लड़की थी। एम. ए., बड़ी ज़हीन और तबियत की बहुत अच्छी। मगर उसकी नाक चिपटी थी। ख़ाला की बेटी हुस्न आरा थी और बेहद काली। सोग़रा थी मगर उसके माँ-बाप बड़े ख़सीस थे। जहेज़ में जितने जोड़े जमील की माँ चाहती थी, उससे वो आधे भी देने को रज़ामंद नहीं थे। अज़रा का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था।

जमील की माँ ने बड़ी कोशिशों के बाद रावलपिंडी के एक अच्छे और खुशहाल खानदान की लड़की से बातचीत तय कर ली। जमील अपनी नाकाम इश्कबाज़ियों से इतना तंग आ गया था कि उसने अपनी माँ से यह भी न पूछा कि शक्ल सूरत कैसी है। वैसे उसने अपने जिंदा तसव्वर में इसका अंदाज़ा लगा लिया था और मुफ़स्सल तौर पर सोच लिया था कि वो उसकी मुहब्बत में किस तरह गिरफ्तार होगा।

यह सिलसिला काफी देर तक जारी रहा। मैं खुश था कि जमील की शादी हो रही है। उसके मर्ज़-ए-इश्क़ का एक फ़कत यही इलाज़ था।

महीने गुज़र गए। आखिर रावलपिंडी के इस प्रतिष्ठित और खुशहाल घराने की लड़की से जिसका नाम शरीफ़ा था, उसकी मंगनी हो गई।

इस तक़रीब पर उसे ससुराल की तरफ से हीरे की अंगूठी मिली। जो वो हर वक़्त पहने रहता था। इस पर उसने एक नज़्म भी लिखी जिसका कोई शेर मुझे याद नहीं। एक बरस तक सोचता रहा कि उसे अपनी दुल्हन को कब अपने यहाँ लाना चाहिए। आदमी चूंकि आज़ाद और रौशन ख़्याल किस्म का था इसलिए उसकी ख्वाहिश थी कि माँ बाप से अलग अपना घर बनाए। यह कैसा होना चाहिए, इसमें किस डिजाईन का फर्नीचर हो, नौकर कितने हों, माहवार खर्च कितना होगा, सास के साथ उसका क्या सलूक होगा, इन तमाम बातों के बारे में उसने काफी सोच विचार किया। नतीजा यह हुआ कि लड़की वाले तंग आ गए। वो चाहते थे कि रुख़्सती का मरहला जल्द अज़ जल्द तय हो।

जमील इस बारे में कोई फैसला न कर सका। लेकिन उसकी अम्मी ने एक तारीख़ मुक़र्रर कर दी। कार्ड-वार्ड छप गए। वलीमे की दावत के लिए ज़रूरी सामान का बंदोबस्त कर लिया गया। उसके वालिद बुज़ुर्गवार शेख मुहम्मद इस्माईल साहब रिटायर्ड इंजिनियर बहुत खुश थे। मगर जमील बहुत परेशान था। इसलिए कि वो अपने बनने वाले घर का आखरी नक्शा तैयार नहीं कर सका था।

रुख़्सती की तारीख 9 अक्टूबर मुक़र्रर की गयी थी। 8 अक्टूबर की शाम को बहुत देर तक, मेरा ख़्याल है रात के दो बजे तक उस आने वाले हादसे के सम्बन्ध में बातचीत करते रहे। लेकिन किसी नतीजे पर न पहुंचे। आखिर तय यह हुआ कि जो होता है, होने दिया जाए।

और हुआ यह कि 9 अक्टूबर की सुबह को, मुंह अँधेरे जमील मेरे पास सख्त बेचैनी और पीड़ा के आलम में आया और उसने मुझे यह खबर सुनाई कि उसकी मौसी की लड़की अज़रा ने, जो बेवकूफ़ी की हद तक सीधी-साधी थी, ख़ुदकुशी कर ली है। इसलिए कि उसको जमील से बहुत प्रेम था। वो बर्दाश्त न कर सकी कि उसके ‘महबूबो-माबूद’ की शादी किसी और लड़की से हो। इस बारे में उसने जमील के नाम एक ख़त लिखा, जिसकी इबारत बहुत दर्दनाक थी। मेरा ख़्याल है कि यह तहरीर यादगार के तौर पर उसके पास सुरक्षित होगी।

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Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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