इश्क़ की बीमारी में गिरफ़्त

अभी पिछली बीमारी से ‘मुक्ति’ पाया ही था कि एक नई बीमारी ने आकर मुझे घेर लिया। यह ‘इश्क़ की बीमारी’ है। अतः इस बीमारी को मैंने बिना चूं-चपड़ किए लग जाने दिया। न घर न बाहर वालो, किसी को नहीं बताया। और, बीवी को तो भनक तक न लगने दी। बात (इश्क़) का बतंगड़ थोड़े न बनवाना था।

इश्क़ की बीमारी जिससे मिली, वो पड़ोसन है। मामला पड़ोस का है। घर आना जाना है। साथ उठना-बैठना है। कभी-कभार खाना-पीना भी साथ हो जाया करता है। इसलिए ‘शक’ का सवाल लगभग न के बराबर ही है। फिर भी, ध्यान पूरा रखता हूँ। आखिर दीवार और मोबाइल दोनों के ‘कान’ होते हैं जनाब।

कमाल बात यह है कि इश्क़ एकतरफा नहीं है। आग दोनों तरफ बराबर लगी है। जैसे दिन-रात की नींद मेरी गायब है, यही हाल उधर भी है। ऐसा आभास मुझे उसके मेरे व्हाट्सएप्प पर आए संदेशों से हो जाया करता है।

मैं यह मानता हूँ, इश्क़ करने में कोई हर्ज नहीं। दिल जिस पर आए, उससे इश्क़ कर लेना चाहिए। इश्क़ को न सीमाओं में बंधा जा सकता है, न उम्र के खांचे में बंद किया जा सकता।

बस यही सोचकर मैंने भी इश्क़ फरमा लिया।

तो क्या शादीशुदा लोग इश्क़ नहीं करते? जी, खूब करते हैं। इश्क़ ने कभी नहीं कहा कि शादीशुदा लोग इश्क़ न करें।

और फिर मेरा इश्क़ लौंडे-लफाड़ों वाला थोड़े न है। पहली फुर्सत में हुआ है, सो निभा ले रहे हैं। जब तलक निभ जाए।

इश्क़बाजी के बहाने ही सही थोड़ा-बहुत मन अब शेरों-शायरी में भी रमने लगा है। कभी ग़ालिब को पढ़ने का दिल हो आता है, कभी मीर को। कभी ग़ुलाम अली को सुनने बैठ जाता हूँ तो कभी जगजीत सिंह को। कमाल यह है, इश्क़ की बीमारी जब से लगी है, तब से किसी अन्य बीमारी ने छुआ तक नहीं है।

फिलहाल, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि इश्क़ करने के फायदे अनेक हैं, नुकसान बहुत कम। न जाने लोग बाग इश्क़ और इश्क़ वालो को ‘शक’ की निगाह से क्यों देखते हैं!

अच्छा अब चलता हूँ, आज पड़ोसन संग डेट है। कुछ दिल की बातें हो जाएंगी तो दिलो-दिमाग बहल जाएगा।