कच्ची उम्र का पक्का रिश्ता

देखा उसने भी था कभी एक सपना ,
मिलेगा उसे भी कोई अपना,
ख्वाब उसने भी हज़ारो सजाए ,
पर लाखों डर भी थे मन में उसके समाए,
बचपन में सुनकर परियो की कहानी,
उम्मीदें उसकी भी हो गई सायानी,
कोई राजकुमार होगा वो लाखो में एक,
ख़्यालो का सच्चा और दिल का नेक,
किसी फूल की तरह सहलाकर उसको,
ले जाएगा डोली में बैठकर उसको,
लेकिन, बचपन उसका किसी को न प्यारा था
“पराई है बेटियां कहता ये जग सारा था”,
लकीरे उसकी किस्मत, को कही और ही ले गयी ,
नन्ही सी वो जान भी देखो, दुल्हन बन गयी,
नादानियां उसकी, वो गुड्डे गुड़ियों का साथ,
बाबुल का घर जहाँ, थामा था सहेलियों का हाथ,
सब छूट गए रास्ते में कही, जैसे ही लगी थी हाथो पर मेहंदी उसकी,
दहलीज पर डोली उसकी जैसे ही आई ….
यूँ लगा हुई पल भर में जग से पराई,
साथी उसको भी जेसे कोई मिल गया ,
वो साथी जिस से वो अनजान थी,,
न मुलाकात थी, न पहचान थी..
इतिहास फिर से दोहरा गया,
“कच्ची उम्र का पक्का रिश्ता फिर बन गया”।