कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते

कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते
जवानी जो रहती तो फिर हम न रहते

लहू था तमन्ना का आँसू नहीं थे
बहाए न जाते तो हरगिज़ न बहते

वफ़ा भी न होता तो अच्छा था वअ’दा
घड़ी दो घड़ी तो कभी शाद रहते

हुजूम-ए-तमन्ना से घुटते थे दिल में
जो मैं रोकता भी तो नाले न रहते

मैं जागूँगा कब तक वो सोएँगे ता-कै
कभी चीख़ उठ्ठूँगा ग़म सहते सहते

बताते हैं आँसू कि अब दिल नहीं है
जो पानी न होता तो दरिया न बहते

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते

कोई नक़्श और कोई दीवार समझा
ज़माना हुआ मुझ को चुप रहते रहते

मिरी नाव इस ग़म के दरिया में ‘साक़िब’
किनारे पे आ ही लगी बहते बहते