‘कविता: कुछ विचार’ – बालमणि अम्मा

(निबन्ध संग्रह ‘सरस्वती की चेतना’ से; अनुवादक: डॉ. आरसु)

हर आदमी के मन में एक कवि का अंश विद्यमान है। हर निमिष को आस्वाद्य बनाकर, हर कर्म को महत्त्व प्रदान कर, युगान्तरों से मानव-संस्कृति को पालने-पोसनेवाली उस प्रतिभामूर्ति को भारतीय जनमानस आज उपहार दे रहा है। मैं कामना करती हूँ कि भारत की कोटि-कोटि जनता के मन में उस कवि को जाग्रत होकर काम करने का मौका मिले।

मेरा लालन-पालन एक ग्रामीण परिवार में हुआ, जिसमें पूजा के दीप जलते थे। कई पुण्य ग्रन्थ भी उस घर में उपलब्ध थे। उस ग्रामीण घर से प्रज्वलित इस शिखा को स्वतंत्र भारत के निर्माण उत्साह-स्वर से मुखरित होने वाले इस महानगर दिल्ली के सामने मैं रख लेती हूँ। इस चिरंतन भूमि की नित्य तृष्णा उसमें प्रज्वलित होती है। यह स्नेह और शांति की तृष्णा है।

हर बालक चित्र बनाता है और हर युवक कविता लिखता है। बचपन और यौवन शोभन अनुभूतियों का समय है। मनुष्यात्मा महान प्रेम के बल पर इस विश्व के सहजीवी और व्यक्तियों से तादात्मय स्थापित करती है। इस तादात्मय की स्थिति में विशिष्ट अनुभूतियाँ जाग उठती हैं। तब स्वप्नों के दीपक प्रज्वलित होते हैं। आदर्श प्रतिष्ठापित होते हैं। वे दीपक कभी न बुझ पाएँ। वे बिम्ब कभी उखड़ न जाएँ। उनको एक जीवकाल तक बनाए रखने के लिए निरंतर साधना आवश्यक होगी। स्नेह और त्याग की वह साधना कवि के मन को विकसित करती है। इस संसार में कवियों की संख्या हमारी कल्पना से भी ज़्यादा हो जाए। सबसे अच्छी कविता लिखी गई कविता नहीं है अपितु वह जी गई कविता है।

कविता महज जीवन का प्रतिबिम्ब नहीं है, वह जीवन के आंतरिक चैतन्य और उसके सर्वोत्कृष्ट भाव की अभिव्यक्ति है। कवि के भौतिक जीवन की अपेक्षा उसके मानस में टिका आदर्श-जीवन कविता के माध्यम से ज़्यादा उजागर हो उठता है। कवि साधारण जीवन में महोन्नतियों की कामना नहीं कर सकेंगे। आदर्श और जीवन के बीच की खाई को पाटने में दूसरे लोगों की अपेक्षा कवि की अपनी भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। हाँ, उसकी कुछ सीमाएँ हो सकती हैं। मैं मानती हूँ कि सर्वस्वत्याग के एक अमूल्य निमिष में ही मनुष्य पूर्णता प्राप्त कर सकेगा। उस प्रकार का एक मुहूर्त आज नहीं तो अनेक जन्मों के बाद हर मनुष्य प्राप्त कर सकेगा। किन्तु आज वह मेरे लिए केवल एक स्वप्न है।

मैं नहीं मानती कि कविता कठिनाइयों से किया जानेवाला पलायन है। कविता दुःखों का परिमार्जन करके उसे एक उत्कृष्ट रूप प्रदान करने की प्रक्रिया है। कवि जीवन के सुखों के साथ-साथ उसके दुःखों को भी छानकर पीता है; किन्तु वह अश्रु-कण को अपने पाठकों को उसी रूप में नहीं देता। कवि उसको हीरे के रूप में बदल देता है। कभी-कभी दुःख मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है; किन्तु विश्व-प्रेमी कवि को दुःख धीरे-धीरे मानसिक परितोष की ओर ले चलता है।

मेरे लिए तो कविता भी प्रार्थना के समान एक पावन कर्म है। घरेलु कर्तव्यों को निभाने के बाद प्राप्त होनेवाला पूरा समय मैं उसके लिए समर्पित करती हूँ। कितना समय मिलने पर कवि संतुष्ट हो जाएगा? आज पूरी की गई कविता को कल देखने पर उसमें गलतियाँ नज़र आएँगी। तब पुनः काम शुरू होगा। एक अच्छी कविता के हवाई जहाज को उतरने के लिए टीले और गड्ढों से रहित समय का सपाट मैदान चाहिए। अच्छी फसल विश्राम की अवस्था में उगती और कर्म में पक जाती है।

यह मेरा अपना अनुभव है। आवश्यक नहीं कि यह सर्वथा सही हो। आज का उद्योग-धंधे का युग एक द्रुततर तालक्रम रखता है। उससे तालमेल स्थापित करने में भी कविता सक्षम बनती है। एक युवा कवि ने बताया था कि वह अधिकतम व्यस्त जीवन में ही कविता लिख पाता है। यह कथन मेरे मन को विस्मय में डालता है। आदिम अरण्य, बकरी चरते मैदान, सामाजिक सरोकारों को दृढ़ बनाने वाले गाँव, इन सबको पार कर मानव आज शहर में पहुँच गया है। उसके मन का कवि कुछ घबराया होगा। नियंत्रण न रहने के कारण यह स्थिति नहीं आई है। इधर भी वह सौंदर्य और महत्त्व देख सकेगा। ईश्वरीय संदेश सुन पाएगा।

[सन् 1966 में केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कार-प्राप्ति के बाद दिया गया भाषण।]

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