महात्मा गाँधी – कुछ पंक्तियाँ

मैं कितना ही तुच्छ होऊँ, पर जब मेरे माध्यम से सत्य बोलता है तब मैं अजेय हो जाता हूँ।

मेरा अनुयायी सिर्फ एक है और वह खुद मैं हूँ।

भला ‘गांधीवादी ‘ भी कोई नाम में नाम है? उसके बजाय ‘अहिंसावादी’ क्यों नहीं? क्योंकि गांधी तो अच्छाई और बुराई, कमजोरी और मजबूती, हिंसा और अहिंसा का मिश्रण है, जब कि अहिंसा में कोई मिलावट नहीं है।

मुझे इस महात्मा की पदवी को अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए। यद्यपि मैं एक असहयोगी हूँ, पर यदि ऐसा कोई विधेयक लाया जाए जिसके अनुसार मुझे महात्मा कहना और मेरे पाँव छूना अपराध घोषित किया जा सके तो मैं खुशी-खुशी उसका समर्थन करूँगा। जहाँ मैं अपना कानून चलाने की स्थिति में हूँ, जैसे कि अपने आश्रम में, वहाँ ऐसा करने पर एकदम पाबंदी है।

मैं अविवेकी लोगों द्वारा की जानेवाली आराधना-स्तुति से सचमुच परेशान हूँ। इसके स्थान पर यदि वे मेरे ऊपर थूकते, तो मुझे अपनी असलियत का सच्चा अंदाजा रहता।

मैं ‘संत के वेश में राजनेता’ नहीं हूँ। लेकिन चूँकि सत्य सर्वोच्च बुद्धिमत्ता है, इसलिए मेरे कार्य किसी शीर्षस्थ राजनेता के-से कार्य प्रतीत होते हैं। मैं समझता हूँ कि सत्य और अहिंसा की नीति के अलावा मेरी कोई और नीति नहीं है।

बहुत से लोग इस भ्रम में पड़े हुए हैं कि मेरे पास सारे रोगों का उपचार है। काश! ऐसा होता। हालाँकि कह नहीं सकता कि ऐसा हो तो वह विशुद्ध वरदान ही साबित होगा। अगर मैं ऐसी बातों का बिना विचारे सर्वत्र प्रयोग करने लगता तो लोगों को असहाय बना देता।

तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है। लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं य़ह दिखाना चाहता हूँ कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।

यदि मैं अपने अंदर ईश्वर की उपस्थिति अनुभव न करता तो प्रतिदिन इतनी कंगाली और निराशा देखते-देखते प्रलापी पागल हो गया होता या हुगली में छलाँग लगा लेता।

जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कुछ चीजों के लिए हमें बाह्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। हमारे अंदर से एक हल्की-सी आवाज हमें बताती है, ‘तुम सही रास्ते पर हो, दाएँ-बाएँ मुड़ने की जरूरत नहीं है, सीधे और सँकरे रास्ते पर आगे बढ़ते जाओ।’

मैं मानता हूँ कि मुझमें अनेक सुसंगतियाँ हैं। लेकिन चूँकि लोग मुझे ‘महात्मा’ कहते हैं, इसलिए मैं इमर्सन की उक्ति को साधिकार दुहराते हुए कह सकता हूँ कि मूर्खतापूर्ण सुसंगति छोटे दिमागों का हौवा है। मेरा खयाल है कि मेरी असंगतियों में भी एक पद्धति है।

मुझे जीवन भर गलत समझा जाता रहा। हर एक जनसेवक की यही नियति है। उसकी खाल बड़ी मजबूत होनी चाहिए। अगर अपने बारे में कही गई हर गलत बात की सफाई देनी पड़े और उन्हें दूर करना पड़े, तो जीवन भार हो जाए।

अंततः मेरा काम ही शेष रह जाएगा, जो मैंने कहा अथवा लिखा है, वह नहीं।


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

उद्धरण | Quotes

पाब्लो पिकासो – कुछ पंक्तियाँ/उद्धरण

पाब्लो पिकासो – कुछ पंक्तियाँ/उद्धरण (अनुवाद: मनोज पटेल) कला एक झूठ है जो सत्य जानने में हमारी सहायता करती है। हर वह चीज वास्तविक है जिसकी तुम कल्पना कर सकते हो। सभी बच्चे कलाकार होते Read more…

उद्धरण | Quotes

‘झूठा सच’ से यशपाल की कुछ पंक्तियाँ/उद्धरण

‘झूठा सच’ से यशपाल की कुछ पंक्तियाँ/उद्धरण “सच को कल्पना से रंग कर उसी जन समुदाय को सौंप रहा हूँ जो सदा झूठ से ठगा जाकर भी सच के लिए अपनी निष्ठा और उसकी ओर Read more…

उद्धरण | Quotes

‘स्त्रियों के लिए नसीहतें’ – माया एंजेलो

‘स्त्रियों के लिए नसीहतें’ – माया एंजेलो  (अनुवाद: विपिन चौधरी) 1. एक औरत के पास अपने नियंत्रण में पर्याप्त पैसा होना चाहिए ताकि बाहर जाते वक्त या खुद के लिए एक जगह किराए पर लेकर वह Read more…

error:
%d bloggers like this: