मेरा मौन, तुम्हारा गुस्सा

आज उसने फिर मुझसे बात करने की कोशिश की-
“कोई कहानी? कोई कविता?
कभी कुछ भी तो नहीं होता तुम्हारे पास,
मुझे कहने को!”
फिर वो झल्लाई, खूब झल्लाई
और मैं चुपचाप उसकी इस झल्लाहट में,
ढूँढता रहा एक कुटिल आमोद!
कैसे कहता उससे?
“मैं नहीं ढाल पाता बातों में,
तुम्हारे साथ बिताये क्षणों को
और जब तुम इतनी दूर हो मुझसे,
मैं नहीं समझ पाता
कैसे बीत रहा है हर क्षण
तुम्हारे बिना ही?”
मैं बस तुम्हें गुस्साते हुए,
ऐसे ही सुनते रहना चाहता हूँ।
कि अंतिम क्षण जब आने को है
मौन ही श्रेष्ठ नहीं होगा क्या?
कि अब यही क्षण है शेष
जो कभी नहीं बदलेगा हमारे बीच,
मेरा मौन, तुम्हारा गुस्सा।